महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1166, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंअन्तर्भूमिगताश्चान्ये हयानां चरणान्यथ । व्यगृह्णन् दानवा घोरा रथचक्रे च भारत ॥ ८ ॥ भरतनन्दन! कुछ भयंकर दानवोंने, जो पृथ्वीके भीतर घुसे हुए थे, मेरे घोड़ोंके पैर तथा रथके पहिये पकड़ लिये ॥ ८ ॥
विनिगृह्य हरीनश्वान् रथं च मम युध्यतः । सर्वतो मामविध्यन्त सरथं धरणीधरैः ॥ ९ ॥ इस प्रकार युद्ध करते समय मेरे हरे रंगके घोड़ों तथा रथको पकड़कर उन दानवोंने रथसहित मेरे ऊपर सब ओरसे शिलाखण्डोंद्वारा प्रहार आरम्भ किया ॥ ९ ॥
पर्वतैरुपचीयद्भिः पतमानैस्तथापरैः । स देशो यत्र वर्ताम गुहेव समपद्यत ॥ १० ॥ नीचे पर्वतोंके ढेर लग रहे थे और ऊपरसे नयी-नयी चट्टानें पड़ रही थीं। इससे वह प्रदेश जहाँ हमलोग मौजूद थे, एक गुफाके समान बन गया ॥ १० ॥
पर्वतैश्छाद्यमानोऽहं निगृहीतैश्च वाजिभिः । अगच्छं परमामार्ति मातलिस्तदलक्षयत् ॥ ११ ॥ एक ओर तो मैं शिलाखण्डोंसे आच्छादित हो रहा था, दूसरी ओर मेरे घोड़े पकड़ लिये जानेसे रथकी गति कुण्ठित हो गयी थी। इस विवशताकी दशामें मुझे बड़ी पीड़ा होने लगी, जिसे मातलिने जान लिया ॥ ११ ॥
लक्षयित्वा च मां भीतमिदं वचनमब्रवीत् । अर्जुनार्जुन मा भैस्त्वं वज्रमस्त्रमुदीरय ॥ १२ ॥ इस प्रकार मुझे भयभीत हुआ देख मातलिने कहा—'अर्जुन! अर्जुन! तुम डरो मत। इस समय वज्रास्त्रका प्रयोग करो' ॥ १२ ॥
ततोऽहं तस्य तद् वाक्यं श्रुत्वा वज्रमुदीरयम् । देवराजस्य दयितं भीममस्त्रं नराधिप ॥ १३ ॥ महाराज! मातलिका वह वचन सुनकर मैंने देवराजके परम प्रिय तथा भयंकर अस्त्र वज्रका प्रयोग किया ॥ १३ ॥
अचलं स्थानमासाद्य गाण्डीवमनुमन्त्र्य च । अमुञ्चं वज्रसंस्पर्शान्यायसान् निशितान् शरान् ॥ १४ ॥ अविचल स्थानका आश्रय ले गाण्डीव धनुषको वज्रास्त्रसे अभिमन्त्रित करके मैंने लोहेके तीखे बाण छोड़े, जिनका स्पर्श वज्रके समान कठोर था ॥ १४ ॥
ततो मायाश्च ताः सर्वा निवातकवचांश्च तान् । ते वज्रचोदिता बाणा वज्रभूताः समाविशन् ॥ १५ ॥ तदनन्तर वज्रास्त्रसे प्रेरित हुए वे वज्रस्वरूप बाण पूर्वोक्त सारी मायाओं तथा निवातकवच दानवोंके भीतर घुस गये ॥ १५ ॥