भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1196, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1196

जिसका सेवन देवता और सिद्ध पुरुष किया करते हैं ।। तां चाथ दृष्ट्वा नलिनीं विशोकाः पाण्डोः सुताः सर्वनरप्रधानाः ते रेमिरे नन्दनवासमेत्य द्विजर्षयो वीतमला यथैव ।। १० ।। सम्पूर्ण मनुष्योंमें श्रेष्ठ वे पाण्डुपुत्र उस पुष्करिणीका दर्शन करके शोकरहित हो वहाँ इस प्रकार आनन्दका अनुभव करने लगे, मानो निर्मल ब्रह्मर्षिगण इन्द्रके नन्दनवनमें सानन्द विचर रहे हों ।। १० ।। ततः क्रमेणोपययुर्नृवीरा यथागतेनैव पथा समग्राः विहृत्य मासं सुखिनो बदर्यां किरातराज्ञो विषयं सुबाहोः ।। ११ ।। इसके बाद वे सारे नरवीर जिस मार्गसे आये थे, क्रमशः उसी मार्गसे चल दिये। बदरिकाश्रममें एक मासतक सुखपूर्वक विहार करके उन्होंने किरातनरेश सुबाहुके राज्यकी ओर प्रस्थान किया ।। ११ ।। पीनांस्तुषारान् दरदांश्च सर्वान् देशान् कुलिन्दस्य च भूमिरत्नान् अतीत्य दुर्गं हिमवत्प्रदेशं पुरं सुबाहोर्ददृशुर्नृवीराः ।। १२ ।। कुलिन्दके तुषार, दरद आदि धन-धान्यसे युक्त और प्रचुर रत्नोंसे सम्पन्न देशोंको लाँघते हुए हिमालयके दुर्गम स्थानोंको पार करके उन नरवीरोंने राजा सुबाहुका नगर देखा ।। १२ ।। श्रुत्वा च तान् पार्थिवपुत्रपौत्रान् प्राप्तान् सुबाहुर्विषये समग्रान् प्रत्युद्ययौ प्रीतियुतः स राजा तं चाभ्यनन्दन् वृषभाः कुरूणाम् ।। १३ ।। राजा सुबाहुने जब सुना कि मेरे राज्यमें राजपुत्र पाण्डवगण पधारे हुए हैं, तब बहुत प्रसन्न होकर नगरसे बाहर आ उसने उन सबकी अगवानी की। फिर कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर आदिने भी उनका बड़ा समादर किया ।। १३ ।। समेत्य राज्ञा तु सुबाहुना ते सूतैर्विशोकप्रमुखैश्च सर्वे सहेन्द्रसेनैः परिचारिकैश्च पौरोगवैर्ये च महानसस्थाः ।। १४ ।।

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