भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1201

चकोरैरुपचक्रैश्च पक्षिभिर्जीवजीवकैः कोकिलैर्भृङ्गराजैश्च तत्र तत्र निनादितान् ।। ७ ।। वहाँ भिन्न-भिन्न स्थानोंमें चकोर, उपचक्र, जीव-जीवक, कोकिल और भृंगराज आदि पक्षी कलरव करते थे ।। ७ ।।

नित्यपुष्पफलैर्वृक्षैर्हिमसंस्पर्शकोमलैः उपेतान् बहुलच्छायैर्मनोनयननन्दनैः ।। ८ ।। वहाँके वृक्ष सदा फूल और फल देते थे। हिमके स्पर्शसे उनमें कोमलता आ गयी थी। उनकी छाया बहुत घनी थी और वे दर्शनमात्रसे मन एवं नेत्रोंको आनन्द प्रदान करते थे ।। ८ ।।

स सम्पश्यन् गिरिनदीर्वैदूर्यमणिसंनिभैः सलिलैर्हिमसंकाशैर्हंसकारण्डवायुतैः ।। ९ ।। उन वृक्षोंसे सुशोभित प्रदेशों तथा वैदूर्यमणिके समान रंगवाले, हिमसदृश स्वच्छ, शीतल सलिल-समूहसे संयुक्त पर्वतीय नदियोंकी शोभा निहारते हुए वे सब ओर घूमते थे। नदियोंकी उस जलराशिमें हंस और कारण्डव आदि सहस्रों पक्षी किलोलें करते थे ।।

वनानि देवदारूणां मेघानामिव वागुराः हरिचन्दनमिश्राणि तुङ्गकालीयकान्यपि ।। १० ।। हरिचन्दन, तुंग और कालीयक आदि वृक्षोंसे युक्त ऊँचे-ऊँचे देवदारुके वन ऐसे जान पड़ते थे मानो बादलोंको फँसानेके लिये फंदे हों ।। १० ।।

मृगयां परिधावन् स समेषु मरुधन्वसु विध्यन् मृगान् शरैः शुद्धैश्चचार स महाबलः ।। ११ ।। महाबली भीम सारे मरु प्रदेशमें शिकारके लिये दौड़ते और केवल बाणोंद्वारा हिंसक पशुओंको घायल करते हुए विचरा करते थे ।। ११ ।।

भीमसेनस्तु विख्यातो महान्तं दंष्ट्रिणं बलात् निघ्नन् नागशतप्राणो वने तस्मिन् महाबलः ।। १२ ।। भीमसेन अपने महान् बलके लिये विख्यात थे। उनमें सैकड़ों हाथियोंकी शक्ति थी। वे उस वनमें विकराल दाढ़ोंवाले बड़े-से-बड़े सिंहको भी पछाड़ देते थे ।। १२ ।।

मृगाणां स वराहाणां महिषाणां महाभुजः विनिघ्नंस्तत्र तत्रैव भीमो भीमपराक्रमः ।। १३ ।। भीमसेनका पराक्रम भी उनके नामके अनुसार ही भयानक था। उनकी भुजाएँ विशाल थीं। वे मृगयामें प्रवृत्त होकर जहाँ-तहाँ हिंसक पशुओं, वराहों और भैंसोंको भी मारा करते थे ।। १३ ।।

स मातङ्गशतप्राणो मनुष्यशतवारणः सिंहशार्दूलविक्रान्तो वने तस्मिन् महाबलः ।। १४ ।।