भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1210, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1210

'यक्षों तथा राक्षसोंसे भरा हुआ यह हिमालय अत्यन्त दुर्गम है, मेरे भाई व्याकुल होकर जब मुझे खोजेंगे, तब अवश्य कहीं खंदकमें गिर पड़ेंगे॥ ३०॥ विनष्टमथ मां श्रुत्व भविष्यन्ति निरुद्यमाः धर्मशीला मया ते हि बाध्यन्ते राज्यगृद्धिना ॥ ३१ ॥ 'मेरी मृत्यु हुई सुनकर वे राज्य-प्राप्तिका सारा उद्योग छोड़ बैठेंगे। मेरे सभी भाई स्वभावतः धर्मात्मा हैं। मैं ही राज्यके लोभसे उन्हें युद्धके लिये बाध्य करता रहता हूँ॥ ३१ ॥' अथवा नार्जुनो धीमान् विषादमुपयास्यति सर्वास्त्रविदनाधृष्यो देवगन्धर्वराक्षसैः ॥ ३२ ॥ 'अथवा बुद्धिमान् अर्जुन विषादमें नहीं पड़ेंगे; क्योंकि वे सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता हैं। देवता, गन्धर्व तथा राक्षस भी उन्हें पराजित नहीं कर सकते ॥ ३२ ॥' समर्थः स महाबाहुरेकोऽपि सुमहाबलः देवराजमपि स्थानात् प्रच्यावयितुमज्जसा ॥ ३३ ॥ 'महाबली महाबाहु अर्जुन अकेले ही देवराज इन्द्रको भी अनायास ही अपने स्थानसे हटा देनेमें समर्थ हैं॥ ३३ ॥' किं पुनर्धृतराष्ट्रस्य पुत्रं दुर्धूतदेविनम् विद्विष्टं सर्वलोकस्य दम्भमोहपरायणम् ॥ ३४ ॥ 'फिर उस धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको जीतना उनके लिये कौन बड़ी बात है, जो कपटद्यूतका सेवन करनेवाला, लोकद्रोही, दम्भी तथा मोहमें डूबा हुआ है॥' मातरं चैव शोचामि कृपणां पुत्रगृद्धिनीम् यास्माकं नित्यमाशास्ते महत्त्वमधिकं परैः ॥ ३५ ॥ 'मैं पुत्रोंके प्रति स्नेह रखनेवाली अपनी उस दीन माताके लिये शोक करता हूँ, जो सदा यह आशा रखती है कि हम सभी भाइयोंका महत्त्व शत्रुओंसे बढ़-चढ़कर हो॥ ३५ ॥' तस्याः कथं त्वनाथाया मद्दिनाशाद् भुजङ्गम सफलास्ते भविष्यन्ति मयि सर्वे मनोरथाः ॥ ३६ ॥ 'भुजंगम! मेरे मरनेसे मेरी अनाथ माताके वे सभी मनोरथ जो मुझपर अवलम्बित थे, कैसे सफल हो सकेंगे? ॥ ३६ ॥' नकुलः सहदेवश्च यमौ च गुरुवर्तिनौ मद्बाहुबलसंगुप्तौ नित्यं पुरुषमानिनौ ॥ ३७ ॥ 'एक साथ जन्म लेनेवाले नकुल और सहदेव सदा गुरुजनोंकी आज्ञाके पालनमें लगे रहते हैं। मेरे बाहुबलसे सुरक्षित हो वे दोनों भाई सर्वदा अपने पौरुषपर अभिमान रखते हैं॥ ३७ ॥' भविष्यतो निरुत्साहौ भ्रष्टवीर्यपराक्रमौ

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