भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1216

सत्यं सर्प वचो ब्रूहि पृच्छति त्वां युधिष्ठिरः । किमर्थं च त्वया ग्रस्तो भीमसेनो भुजङ्गम ॥ ९ ॥ **युधिष्ठिरने कहा—**सर्प! तुम कोई देवता हो या दैत्य अथवा वास्तवमें सर्प ही हो? सच बताओ, तुमसे युधिष्ठिर प्रश्न कर रहा है। भुजंगम! किस लिये तुमने भीमसेनको ही अपना ग्रास बनाया है? ॥ ९ ॥

किमाहृत्य विदित्वा वा प्रीतिस्ते स्याद् भुजङ्गम । किमाहारं प्रयच्छामि कथं मुञ्चेद् भवानिमम् ॥ १० ॥ बोलो, तुम्हारे लिये क्या ला दिया जाय? अथवा तुम्हें किस बातका ज्ञान करा दिया जाय? जिससे तुम प्रसन्न होओगे। मैं कौन-सा आहार दे दूँ अथवा किस उपायका अवलम्बन करूँ, जिससे तुम इन्हें छोड़ सकते हो? ॥ १० ॥

सर्प उवाच

नहुषो नाम राजाहमासं पूर्वस्तवानघ । प्रथितः पञ्चमः सोमादायुः पुत्रो नराधिप ॥ ११ ॥ **सर्प बोला—**निष्पाप नरेश! मैं पूर्वजन्ममें तुम्हारा विख्यात पूर्वज नहुष नामका राजा था। चन्द्रमासे पाँचवीं पीढ़ीमें जो आयु नामक राजा हुए थे, उन्हींका मैं पुत्र हूँ ॥ ११ ॥

क्रतुभिस्तपसा चैव स्वाध्यायेन दमेन च । त्रैलोक्यैश्वर्यमव्यग्रं प्राप्तोऽहं विक्रमेण च ॥ १२ ॥ मैंने अनेक यज्ञ किये, तपस्या की, स्वाध्याय किया तथा अपने मन और इन्द्रियोंके संयमरूप योगका अभ्यास किया। इन सत्कर्मोंसे तथा अपने पराक्रमसे भी मुझे तीनों लोकोंका निष्कण्टक साम्राज्य प्राप्त हुआ था ॥ १२ ॥

तदैश्वर्यं समासाद्य दर्पो मामगमत् तदा । सहस्रं हि द्विजातीनामुवाह शिबिकां मम ॥ १३ ॥ ऐश्वर्यमदमत्तोऽहमवमन्य ततो द्विजान् । इमामगस्त्येन दशामानीतः पृथिवीपते ॥ १४ ॥ न तु मामजहात् प्रज्ञा यावदद्येति पाण्डव । तस्यैवानुग्रहाद् राजन्नगस्त्यस्य महात्मनः ॥ १५ ॥ तब उस ऐश्वर्यको पाकर मेरा अहंकार बढ़ गया। मैंने सहस्रों ब्राह्मणोंसे अपनी पालकी ढुलवायी। तदनन्तर ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त हो मैंने बहुत-से ब्राह्मणोंका अपमान किया। पृथ्वीपते! इससे कुपित हुए महर्षि अगस्त्यने मुझे इस अवस्थाको पहुँचा दिया। पाण्डुनन्दन नरेश! उन्हीं महात्मा अगस्त्यकी कृपासे आजतक मेरी स्मरणशक्ति मुझे छोड़ नहीं सकी है। (मेरी स्मृति ज्यों-की-त्यों बनी हुई है) ॥ १३—१५ ॥

षष्ठे काले मयाऽऽहारः प्राप्तोऽयमनुजस्तव ।