महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1226, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंकृतं कार्यं महाराज त्वया मम परंतप । क्षीणःशापः सुकृच्छ्रो मे त्वया सम्भाष्य साधुना ॥ ३२ ॥ परंतप महाराज! आज तुमने मेरा बहुत बड़ा कार्य किया। इस समय तुम-जैसे श्रेष्ठ पुरुषसे वार्तालाप करनेके कारण मेरा वह अत्यन्त कष्टदायक शाप निवृत्त हो गया ॥ ३२ ॥ अहं हि दिवि दिव्येन विमानेन चरन् पुरा । अभिमानेन मत्तः सन् कंचिन्नान्यमचिन्तयम् ॥ ३३ ॥ पूर्वकालमें (जब मैं स्वर्गका राजा था,) दिव्य विमानपर चढ़कर आकाशमें विचरता रहता था। उस समय अभिमानसे मत्त होकर मैं दूसरे किसीको कुछ नहीं समझता था ॥ ३३ ॥ ब्रह्मर्षिदेवगन्धर्वयक्षराक्षसपन्नगाः । करान् मम प्रयच्छन्ति सर्वे त्रैलोक्यवासिनः ॥ ३४ ॥ ब्रह्मर्षि, देवता गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और नाग आदि जो भी इस त्रिलोकीमें निवास करनेवाले प्राणी थे, वे सब मुझे कर देते थे ॥ ३४ ॥ चक्षुषा यं प्रपश्यामि प्राणिनं पृथिवीपते । तस्य तेजो हराम्याशु तद्धि-दृष्टेर्बलं मम ॥ ३५ ॥ राजन्! उन दिनों मैं जिस प्राणीकी ओर आँख उठाकर देखता था, उसका तेज तत्काल हर लेता था। यह थी मेरी दृष्टिकी शक्ति ॥ ३५ ॥ ब्रह्मर्षीणां सहस्रं हि उवाह शिबिकां मम । स मामपनयो राजन् भ्रंशयामास वै श्रियः ॥ ३६ ॥ हजारों ही ब्रह्मर्षि मेरी पालकी ढोते थे। महाराज! मेरे इसी अत्याचारने मुझे स्वर्गकी राज्यलक्ष्मीसे भ्रष्ट कर दिया ॥ ३६ ॥ तत्र ह्यगस्त्यः पादेन वहन् स्पृष्टो मया मुनिः । अगस्त्येन ततोऽस्म्युक्तः सर्पस्त्वं च भवेति ह ॥ ३७ ॥ स्वर्गमें मुनिवर अगस्त्य जब मेरी पालकी ढो रहे थे, तब मैंने उन्हें लात मारी, इसलिये उन्होंने मुझे ऐसा कहा कि 'तू निश्चय ही सर्प हो जा' ॥ ३७ ॥ ततस्तस्माद् विमानाग्र्यात् प्रच्युतश्च्युतलक्षणः । प्रपतन् बुबुधेऽत्मानं व्यालीभूतमधोमुखम् । आयाचं तमहं विप्रं शापस्यान्तो भवेदिति ॥ ३८ ॥ उनके इतना कहते ही मेरे सभी राजचिह्न लुप्त हो गये। मैं (सर्प होकर) उस उत्तम विमानसे नीचे गिरा। उस समय मुझे ज्ञात हुआ कि मैं सर्प होकर नीचे मुँह किये गिर रहा हूँ; तब मैंने शापका अन्त होनेके उद्देश्यसे उन ब्रह्मर्षिसे याचना करते हुए कहा ॥ ३८ ॥ सर्प उवाच