भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1228, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1228

वैशम्पायनजी कहते है— जनमेजय! तदनन्तर उसी मुहूर्तमें एक इच्छानुसार चलनेवाला उत्तम विमान बड़े जोरकी उड़ानके, साथ वहाँ आ पहुँचा। युधिष्ठिरसे पूर्वोक्त बातें कहकर राजा नहुषने अजगरका शरीर त्याग दिया और दिव्य शरीर धारण करके वे पुनः स्वर्गलोकको चले गये ॥ ४४ ॥

युधिष्ठिरोऽपि धर्मात्मा भ्रात्रा भीमेन संगत: ।
धौम्येन सहित: श्रीमाना श्रमं पुनरागमत् ॥ ४५ ॥
धर्मात्मा युधिष्ठिर भी भाई भीमसेनसे मिलकर उनके और धौम्य मुनिके साथ फिर अपने आश्रमपर लौट आये ॥ ४५ ॥
ततो द्विजेभ्य: सर्वेभ्य: समेतेभ्यो यथातथम् ।
कथयामास तत् सर्वं धर्मराजो युधिष्ठिर: ॥ ४६ ॥
तब धर्मराज युधिष्ठिरने वहाँ एकत्र हुए सब ब्राह्मणोंको भीमसेनके सर्पके चंगुलसे छूटनेका वह सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥ ४६ ॥
तच्छ्रुत्वा ते द्विजा: सर्वे भ्रातरश्चास्य ते त्रय: ।
आसन् सुव्रीडिता राजन् द्रौपदी च यशस्विनी ॥ ४७ ॥
राजन्! यह सुनकर सब ब्राह्मण, उनके तीनों भाई और यशस्विनी द्रौपदी सब-के-सब बड़े लज्जित हुए ॥ ४७ ॥

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