भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1231

सिन्धवः शोभयांचक्रुः काननानि तपात्यये ।। ६ ।। वर्षा-ऋतुकी नदियाँ बड़े वेगसे छूटनेवाले शीघ्र-गामी बाणोंकी भाँति सनसनाती हुई चलती थीं। उनके जलमें हिलोरें उठती रहती थीं और वे कितने ही काननोंकी शोभा बढ़ाती थीं ।। ६ ।। नदतां काननान्तेषु श्रूयन्ते विविधाः स्वनाः । वृष्टिभिश्च्छाद्यमानानां वराहमृगपक्षिणाम् ।। ७ ।। वनके भीतर वर्षाकी बौछारोंसे भीगते और बोलते हुए वराह, मृग और पक्षियोंकी भाँति-भाँतिकी बोलियाँ सुनायी देती थीं ।। ७ ।। स्तोककाः शिखिनश्चैव पुंस्कोकिलगणैः सह । मत्ताः परिपतन्ति स्म दर्दुराश्चैव दर्पिताः ।। ८ ।। पपीहा और मोर नर-कोकिलोंके साथ आनन्दोन्मत्त होकर इधर-उधर उड़ने लगे और मेढक भी घमण्डमें आकर इधर-उधर कूदते और टर्र-टर्र करते थे ।। ८ ।। तथा बहुविधाकारा प्रावृण्मेघानुनादिता । अभ्यतीता शिवा तेषां चरतां मरुधन्वसु ।। ९ ।। पाण्डव अभी मरुप्रदेशमें ही विचरते थे, तभी मेघोंकी गर्जनासे गूँजती तथा अनेक प्रकारके रूप-रंग लिये प्रकट हुई मंगलमयी वर्षा-ऋतु भी बीत गयी ।। ९ ।। क्रौञ्चहंससमाकीर्णा शरत् प्रमुदिताभवत् । रूढकक्षवनप्रस्था प्रसन्नजलनिम्नगा ।। १० ।। विमलाकाशनक्षत्रा शरत् तेषां शिवाभवत् । मृगद्विजसमाकीर्णा पाण्डवानां महात्मनाम् ।। ११ ।। तत्पश्चात् आनन्दमयी शरद्-ऋतुका शुभागमन हुआ। क्रौञ्च और हंस आदि पक्षी चारों ओर विचरने लगे। वनोंमें और पर्वतीय शिखरोंपर कास, कुश आदि बहुत बढ़ गये थे। नदियोंका जल स्वच्छ हो गया। आकाश निर्मल होनेसे नक्षत्रोंका आलोक और उज्ज्वल हो उठा। सब ओर मृग और पक्षी कलोल करने लगे। महात्मा पाण्डवोंके लिये यह शरद्-ऋतु अत्यन्त सुखदायिनी थी ।। १०-११ ।। दृश्यन्ते शान्तरजसः क्षपा जलदशीतलाः । ग्रहनक्षत्रसङ्घैश्च सोमेन च विराजिताः ।। १२ ।। उस समयकी रातें धूलरहित एवं निर्मल दिखायी देती थीं। बादलोंके समान उनमें शीतलता थी। ग्रहों और नक्षत्रोंके समुदाय तथा चन्द्रमा उनकी शोभा बढ़ाते थे ।। १२ ।। कुमुदैः पुण्डरीकैश्च शीतवारिधराः शिवाः । नदीः पुष्करिणीश्चैव ददृशुः समलंकृताः ।। १३ ।। पाण्डवोंने देखा, नदियाँ और पोखरियाँ कुमुदों तथा कमल-पुष्पोंसे अलंकृत हैं। उनमें शीतल जल भरा हुआ है और वे सबके लिये सुखदायिनी प्रतीत होती हैं ।। १३ ।।