महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस पूजयित्वा मधुहा यथावत् पार्थं च कृष्णां च पुरोहितं च । उवाच राजानमभिप्रशंसन् युधिष्ठिरं तत्र सहोपविश्य ॥ १५ ॥ भगवान् मधुसूदनने अर्जुन, द्रौपदी तथा पुरोहित धौम्यका सम्मान करके सबके साथ बैठकर राजा युधिष्ठिरकी प्रशंसा करते हुए कहा— ॥ १५ ॥
धर्मः परः पाण्डव राज्यलाभात् तस्यार्थमाहुस्तप एव राजन् । सत्यार्जवाभ्यां चरता स्वधर्मं जितस्त्वयायं च परश्च लोकः ॥ १६ ॥ ‘राजन्! पाण्डुनन्दन! राज्यलाभकी अपेक्षा धर्म महान् है। धर्मकी वृद्धिके लिये तपको ही प्रधान साधन बताया गया है। आप सत्य और सरलता आदि सद्गुणोंके साथ-साथ स्वधर्मका पालन करते हैं, अतः आपने इस लोक और परलोक दोनोंको जीत लिया है ॥ १६ ॥
अधीतमग्रे चरता व्रतानि सम्यग् धनुर्वेदमवाप्यकृत्स्नम् । क्षात्रेण धर्मेण वसूनि लब्ध्वा सर्वे ह्यवाप्ताः क्रतवः पुराणाः ॥ १७ ॥ न ग्राम्यधर्मेषु रतिस्तवास्ति कामान्न किंचित् कुरुषे नरेन्द्र । न चार्थलोभात् प्रजहासि धर्मं तस्मात् प्रभावादसि धर्मराजः ॥ १८ ॥ ‘आपने सबसे पहले ब्रह्मचर्य आदि व्रतोंका पालन करते हुए सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन किया है। तत्पश्चात् सम्पूर्ण धनुर्वेदकी शिक्षा प्राप्त की है। इसके बाद क्षत्रिय-धर्मके अनुसार धनका उपार्जन करके समस्त प्राचीन यज्ञोंका अनुष्ठान किया है। नरेश्वर! जिसमें गँवारोंकी आसक्ति हुआ करती है, उस स्त्री-सम्बन्धी भोगमें आपका अनुराग नहीं है। आप कामनासे प्रेरित होकर कुछ नहीं करते हैं और धनके लोभसे धर्मका त्याग नहीं करते हैं। इसी प्रभावसे धर्मराज कहलाते हैं ॥ १७-१८ ॥
दानं च सत्यं च तपश्च राजन् श्रद्धा च बुद्धिश्च क्षमा धृतिश्च । अवाप्य राष्ट्राणि वसूनि भोगा- नेषा परा पार्थ सदा रतिस्ते ॥ १९ ॥