महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउनके इस प्रकार आज्ञा देनेपर उन ब्राह्मणोंसहित पाण्डव मध्याह्नकालके सूर्यकी भाँति तेजस्वी उन महामुनिको देखते हुए उनके वक्तव्यको सुननेके लिये चुप हो गये ॥ ५२ ॥
वैशम्पायन उवाच
तं विवक्षन्तमालक्ष्य कुरुराजो महामुनिम् ।
कथासंजननार्थाय चोदयामास पाण्डवः ॥ ५३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! महामुनि मार्कण्डेयजीको बोलनेके लिये उद्यत देख कुरुराज पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरने कथा प्रारम्भ करनेके लिये इस प्रकार प्रेरित किया— ॥ ५३ ॥
भवान् दैवतदैत्यानामृषीणां च महात्मनाम् ।
राजर्षीणां च सर्वेषां चरितज्ञः पुरातनः ॥ ५४ ॥
‘महामुने! आप देवताओं, दैत्यों, ऋषियों, महात्माओं तथा समस्त राजर्षियोंके चरित्रोंको जाननेवाले प्राचीन महर्षि हैं ॥ ५४ ॥
सेव्यश्चोपासितव्यश्च मतो नः कङ्क्षितश्चिरम् ।
अयं च देवकीपुत्रः प्राप्तोऽस्मानवलोककः ॥ ५५ ॥
‘हमारे मनमें दीर्घकालसे यह इच्छा थी कि हमें आपकी ये सेवा और सत्संगका शुभ अवसर मिले। ये देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण भी हमसे मिलनेके लिये यहाँ पधारे हैं ॥ ५५ ॥
भवत्येव हि मे बुद्धिर्दृष्ट्वाऽऽत्मानं सुखाच्च्युतम् ।
धार्तराष्ट्रांश्च दुर्वृत्तान्ऋध्यतः प्रेक्ष्य सर्वशः ॥ ५६ ॥
‘ब्रह्मन्! जब मैं अपनेको सुखसे वञ्चित पाता हूँ और दुराचारी धृतराष्ट्रपुत्रोंको सब प्रकारसे समृद्धिशाली होते देखता हूँ, तब स्वभावतः ही मेरे मनमें एक विचार उठता है ॥ ५६ ॥
कर्मणः पुरुषः कर्ता शुभस्याप्यशुभस्य वा ।
स फलं तदुपाश्नाति कथं कर्ता स्विदीश्वरः ॥ ५७ ॥
कुतो वा सुखदुःखेषु नृणां ब्रह्मविदां वर ।
इह वा कृतमन्वेति परदेहेऽथ वा पुनः ॥ ५८ ॥
‘मैं सोचता हूँ, शुभ और अशुभ कर्म करनेवाला जो पुरुष है, वह अपने उन कर्मोंका फल कैसे भोगता है तथा ईश्वर उन कर्मफलोंका रचयिता कैसे होता है? ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ मुनीश्वर! सुख और दुःखकी प्राप्ति करानेवाले कर्मोंमें मनुष्योंकी प्रवृत्ति कैसे होती है? मनुष्यका किया कर्म इस लोकमें ही उसका अनुसरण करता है अथवा पारलौकिक शरीरमें भी ॥ ५७-५८ ॥
देही च देहं संत्यज्य मृग्यमाणः शुभाशुभैः ।