महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'ब्रह्मन्! हम यह सब रहस्य सुनना चाहते हैं। यदि सुननेयोग्य हो तो कहिये'। तब महर्षिने उन क्षत्रियोंसे कहा—'राजाओ! हम लोगोंपर मृत्युका वश नहीं चलता'।। १७ ।। कारणं वः प्रवक्ष्यामि हेतुयोगसमासतः । (मृत्युः प्रभवने येन नास्माकं नृपसत्तमाः । शुद्धाचारा अनलसाः संध्योपासनतत्पराः ।। शुद्धान्नाः शुद्धसुधना ब्रह्मचर्यव्रतान्विताः ।) सत्यमेवाभिजानीमो नानृते कुर्महे मनः । स्वधर्ममनुतिष्ठामस्तस्मान्मृत्युभयं न नः ।। १८ ।। 'इसका क्या कारण है? यह मैं तर्क और युक्तिके साथ संक्षेपसे बता रहा हूँ। श्रेष्ठ नृपतिगण! हमलोगोंपर मृत्युका प्रभाव क्यों नहीं पड़ता—यह बताते हैं, सुनिये—हम शुद्ध आचार-विचारसे रहते हैं, आलस्यसे रहित हैं, प्रतिदिन संध्योपासनके परायण रहते हैं, शुद्ध अन्न खाते हैं और शुद्ध रीतिसे न्यायपूर्वक धनोपार्जन करते हैं; यही नहीं हमलोग सदा ब्रह्मचर्यव्रतके पालनमें लगे रहते हैं। हमलोग केवल सत्यको ही जानते हैं। कभी झूठमें मन नहीं लगाते और सदा अपने धर्मका पालन करते रहते हैं। इसलिये हमें मृत्युसे भय नहीं है।। १८ ।। यद् ब्राह्मणानां कुशलं तदेषां कथयामहे । नैषां दुश्चरितं ब्रूमस्तस्मान्मृत्युभयं न नः ।। १९ ।। अतिथीनन्नपानेन भृत्यानत्यशनेन च । सम्भोज्य शेषमश्नीमस्तस्मान्मृत्युभयं न नः ।। २० ।। 'ब्राह्मणोंके जो शुभ कर्म हैं, उन्हींकी हम चर्चा करते हैं। उनके दोषोंका बखान नहीं करते हैं। इसलिये हमें मृत्युसे भय नहीं है। हम अतिथियोंको अन्न और जलसे तृप्त करते हैं। हमारे ऊपर जिनके भरण-पोषणका भार है, उन्हें हम पूरा भोजन देते हैं और उन्हें भोजन करानेसे बचा हुआ अन्न हम स्वयं भोजन करते हैं, अतः हमें मृत्युसे भय नहीं है।। १९-२० ।। शान्ता दान्ताः क्षमाशीलास्तीर्थदानपरायणाः । पुण्यदेशनिवासाच्च तस्मान्मृत्युभयं न नः । तेजस्विदेशवासाच्च तस्मान्मृत्युभयं न नः ।। २१ ।। 'हम सदा शम, दम, क्षमा, तीर्थ-सेवन और दानमें तत्पर रहनेवाले हैं तथा पवित्र देशमें निवास करते हैं। इसलिये भी हमें मृत्युसे भय नहीं है। इतना ही नहीं हमलोग तेजस्वी पुरुषोंके देशमें निवास करते हैं अर्थात् सत्पुरुषोंके समीप रहा करते हैं। इस कारणसे भी हमें मृत्युसे भय नहीं होता है।। २१ ।। एतद् वै लेशमात्रं वः समाख्यातं विमत्सराः । गच्छध्वं सहिताः सर्वे न पापाद् भयमस्ति वः ।। २२ ।।