महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चभिः पतिभिर्जाताः कुमारा मे महौजसः । एतेषामप्यवेक्षार्थं त्रातव्यास्मि जनार्दन ॥ ७२ ॥ जनार्दन! इन पाँच पतियोंसे उत्पन्न हुए मेरे महाबली पाँच पुत्र हैं। उनकी देखभालके लिये भी मेरी रक्षा आवश्यक थी ॥ ७२ ॥
प्रतिविन्ध्यो युधिष्ठिरात् सुतसोमो वृकोदरात् । अर्जुनाच्छ्रुतकीर्तिश्च शतानीकस्तु नाकुलिः ॥ ७३ ॥ कनिष्ठाच्छ्रुतकर्मा च सर्वे सत्यपराक्रमाः । प्रद्युम्नो यादृशः कृष्ण तादृशास्ते महारथाः ॥ ७४ ॥ युधिष्ठिरसे प्रतिविन्ध्य, भीमसेनसे सुतसोम, अर्जुनसे श्रुतकीर्ति, नकुलसे शतानीक और छोटे पाण्डव सहदेवसे श्रुतकर्माका जन्म हुआ है। ये सभी कुमार सच्चे पराक्रमी हैं। श्रीकृष्ण! आपका पुत्र प्रद्युम्न जैसा शूरवीर है, वैसे ही वे मेरे महारथी पुत्र भी हैं ॥ ७३-७४ ॥
नन्विमे धनुषि श्रेष्ठा अजेया युधि शात्रवैः । किमर्थं धार्तराष्ट्राणां सहन्ते दुर्बलीयसाम् ॥ ७५ ॥ ये धनुर्विद्यामें श्रेष्ठ तथा शत्रुओंद्धारा युद्धमें अजेय हैं तो भी दुर्बल धृतराष्ट्र-पुत्रोंका अत्याचार कैसे सहन करते हैं? ॥ ७५ ॥
अधर्मेण हृतं राज्यं सर्वे दासाः कृतास्तथा । सभायां परिकृष्टाहमेकवस्त्रा रजस्वला ॥ ७६ ॥ अधर्मसे सारा राज्य हरण कर लिया गया, सब पाण्डव दास बना दिये गये और मैं एकवस्त्रधारिणी रजस्वला होनेपर भी सभामें घसीटकर लायी गयी ॥ ७६ ॥
नाधिज्यमपि यच्छक्यं कर्तुमन्येन गाण्डिवम् । अन्यत्रार्जुनभीमाभ्यां त्वया वा मधुसूदन ॥ ७७ ॥ मधुसूदन! अर्जुनके पास जो गाण्डीव धनुष है, उसपर अर्जुन, भीम अथवा आपके सिवा दूसरा कोई प्रत्यंचा भी नहीं चढ़ा सकता (तो भी ये मेरी रक्षा न कर सके) ॥ ७७ ॥
धिग् बलं भीमसेनस्य धिक् पार्थस्य च पौरुषम् । यत्र दुर्योधनः कृष्ण मुहूर्तमपि जीवति ॥ ७८ ॥ कृष्ण! भीमसेनके बलको धिक्कार है, अर्जुनके पुरुषार्थको भी धिक्कार है, जिसके होते हुए दुर्योधन इतना बड़ा अत्याचार करके दो घड़ी भी जीवित रह रहा है ॥ ७८ ॥
य एतानाक्षिपद् राष्ट्रात् सह मात्राविहिंसकान् । अधीयानान् पुरा बालान् व्रतस्थान् मधुसूदन ॥ ७९ ॥ मधुसूदन! पहले बाल्यावस्थामें, जब कि पाण्डव ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए अध्ययनमें लगे थे, किसीकी हिंसा नहीं करते थे, जिन दुष्टने इन्हें इनकी माताके साथ राज्यसे बाहर निकाल दिया था ॥ ७९ ॥