महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1283, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्थानोंमें) ब्रह्माजीके द्वारा जो जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज नामक चार प्रकारके प्राणी रचे जाते हैं, उन्हें एकमात्र आप ही (सबसे पहले) अच्छी तरह देख पाते हैं ॥ ५-६ ॥ त्वया लोकगुरुः साक्षात् सर्वलोकपितामहः । आराधितो द्विजश्रेष्ठ तत्परेण समाधिना ॥ ७ ॥ स्वप्रमाणमथो विप्र त्वया कृतमनेकGeneric/शः? -> शः । घोरेणाविश्य तपसा वेधसो निर्जितास्त्वया ॥ ८ ॥ द्विजश्रेष्ठ! आपने तत्परतापूर्वक चित्तवृत्तियोंका निरोध करके सम्पूर्ण लोकोंके पितामह साक्षात् लोकगुरु ब्रह्माजीकी आराधना की है। विप्रवर! आपने अनेक बार इस जगत्की प्रारम्भिक सृष्टिको प्रत्यक्ष किया है और घोर तपस्याद्वारा (मरीचि आदि) प्रजापतियोंको भी जीत लिया है ॥ ७-८ ॥ नारायणाङ्कप्रख्यस्त्वं साम्परायेऽतिपठ्यसे । भगवाननेकशः कृत्वा त्वया विष्णोश्च विश्वकृत् ॥ ९ ॥ कर्णिकोद्धरणं दिव्यं ब्रह्मणः कामरूपिणः । रत्नालंकारयोगाभ्यां दृग्भ्यां दृष्टस्त्वया पुरा ॥ १० ॥ आप भगवान् नारायणके समीप रहनेवाले भक्तोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। परलोकमें आपकी महिमाका सर्वत्र गान होता है। आपने पहले स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले सर्वव्यापक ब्रह्मकी उपलब्धिके स्थानभूत हृदयकमलकी कर्णिकाका (योगकी कलासे) अलौकिक उद्घाटन कर वैराग्य और अभ्याससे प्राप्त हुई दिव्य दृष्टिद्वारा विश्वरचयिता भगवान्का अनेक बार साक्षात्कार किया है ॥ ९-१० ॥ तस्मात् तवान्तको मृत्युर्जरा वा देहनाशिनी । न त्वां विशति विप्रर्षे प्रसादात् परमेष्ठिनः ॥ ११ ॥ इसीलिये सबको मारनेवाली मृत्यु तथा शरीरको जर्जर बना देनेवाली जरा आपका स्पर्श नहीं करती है। ब्रह्मर्षे! इसमें भगवान् परमेष्ठीका कृपाप्रसाद ही कारण है ॥ ११ ॥ यदा नैवं रविर्नाग्निर्न वायुर्न च चन्द्रमाः । नैवान्तरिक्षं नैवोर्वी शेषं भवति किंचन ॥ १२ ॥ तस्मिन्नेकार्णवे लोके नष्टे स्थावरजङ्गमे । नष्टे देवासुरगणे समुत्सन्नमहोरगे ॥ १३ ॥ शयानममितात्मानं पद्मोत्पलनिकेतनम् । त्वमेकः सर्वभूतेशं ब्रह्माणमुपतिष्ठसि ॥ १४ ॥ (महाप्रलयके समय) जब सूर्य, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, अन्तरिक्ष और पृथिवी आदिमेंसे कोई भी शेष नहीं रह जाता, समस्त चराचर जगत् उस एकार्णवके जलमें डूबकर अदृश्य हो जाता है, देवता और असुर नष्ट हो जाते हैं तथा बड़े-बड़े नागोंका संहार हो जाता है, उस