महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजनेश्वर! युगान्तकालमें गायोंके थनोंमें बहुत कम दूध होगा। वृक्षपर फल और फूल बहुत कम होंगे और उनपर (अच्छे पक्षियोंकी अपेक्षा) कौए ही अधिक बसेरे लेंगे। भूपाल! ब्राह्मणलोग (लोभवश) ब्रह्महत्या-जैसे पापोंसे लिप्त और मिथ्यावादी नरेशोंसे ही दान-दक्षिणा लेंगे ।। ४३-४४ ।।
लोभमोहपरीताश्च मिथ्याधर्मध्वजावृताः ।
भिक्षार्थं पृथिवीपाल चञ्चूर्यन्ते द्विजैर्दिशः ।। ४५ ।।
राजन्! वे ब्राह्मण लोभ और मोहमें फँसकर झूठे धर्मका ढोंग रचनेवाले होंगे, इतना ही नहीं, वे भिक्षाके लिये सारी दिशाओंके लोगोंको पीड़ित करते रहेंगे ।। ४५ ।।
करभारभयाद् भीता गृहस्थाः परिमोषकाः ।
मुनिच्छद्माकृतिच्छन्ना वाणिज्यमुपजीविनः ।। ४६ ।।
मिथ्या च नखरोमाणि धारयन्ति तदा द्विजाः ।
गृहस्थलोग करके भारसे डरकर लुटेरे बन जायँगे। ब्राह्मण मुनियों-जैसी कपटपूर्ण आकृति धारण किये वैश्यवृत्तिसे जीविका चलायेंगे और झूठे दिखावेके लिये नख तथा दाढ़ी-मूंछ धारण करेंगे ।। ४६ १/२ ।।
अर्थलोभान्नरव्याघ्र तथा च ब्रह्मचारिणः ।। ४७ ।।
आश्रमेषु वृथाचाराः पानपा गुरुतल्पगाः ।
इह लौकिकमीहन्ते मांसशोणितवर्धनम् ।। ४८ ।।
नरश्रेष्ठ! धनके लोभसे ब्रह्मचारी भी आश्रमोंमें दम्भपूर्ण आचारको अपनायेंगे और मद्यपान करके गुरुपत्नीगमन करेंगे। लोग अपने शरीरके मांस और रक्त बढ़ानेवाले इहलौकिक कर्मोंमें ही लगे रहेंगे ।।
बहुपाषण्डसंकीर्णाः परान्नगुणवादिनः ।
आश्रमा मनुजव्याघ्र भविष्यन्ति युगक्षये ।। ४९ ।।
नरश्रेष्ठ! युगान्तकालमें सभी आश्रम अनेक प्रकारके पाखण्डोंसे व्याप्त और दूसरोंसे मिले हुए भोजनका ही गुणगान करनेवाले होंगे ।। ४९ ।।
यथर्तुवर्षी भगवान् न तथा पाकशासनः ।
न चापि सर्वबीजानि सम्यग् रोहन्ति भारत ।। ५० ।।
भगवान् इन्द्र भी ठीक वर्षाऋतुके समय जलकी वर्षा नहीं करेंगे। भारत! भूमिमें बोये हुए सभी बीज ठीकसे नहीं जमेंगे ।। ५० ।।
हिंसाभिरमश्च जनस्तथा सम्पद्यतेऽशुचिः ।
अधर्मफलमत्यर्थं तदा भवति चानघ ।। ५१ ।।
कलियुगमें सब लोग हिंसामें ही सुख माननेवाले तथा अपवित्र रहेंगे। निष्पाप! उस समय अधर्मका फल बहुत अधिक मात्रामें मिलेगा ।। ५१ ।।
तदा च पृथिवीपाल यो भवेद् धर्मसंयुतः ।