महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1291, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंभरतकुलभूषण! उस समय जो भी तृण-काष्ठ अथवा सूखे-गीले पदार्थ होते हैं, वे सभी भस्मीभूत दिखायी देने लगते हैं ॥ ६८ ॥ ततः संवर्तको वह्निर्वायुना सह भारत । लोकमाविशते पूर्वमादित्यैरुपशोषितम् ॥ ६९ ॥ भारत! इसके बाद ‘संवर्तक’ नामकी प्रलयकालीन अग्नि वायुके साथ उन सम्पूर्ण लोकोंमें फैल जाती है, जहाँका जल पहले सात सूर्योंद्वारा सोख लिया गया है ॥ ६९ ॥ ततः स पृथिवीं भित्त्वा प्रविश्य च रसातलम् । देवदानवयक्षाणां भयं जनयते महत् ॥ ७० ॥ तत्पश्चात् पृथिवीका भेदन कर वह अग्नि रसातलतक पहुँच जाती है तथा देवता, दानव और यक्षोंके लिये महान् भय उपस्थित कर देती है ॥ ७० ॥ निर्दहन् नागलोकं च यच्च किञ्चित् क्षिताविह । अधस्तात् पृथिवीपाल सर्वं नाशयते क्षणात् ॥ ७१ ॥ राजन्! वह नागलोकको जलाती हुई इस पृथिवीके नीचे जो कुछ भी है, उस सबको क्षणभरमें नष्ट कर देती है ॥ ७१ ॥ ततो योजनविंशानां सहस्राणि शतानि च । निर्दहत्यशिवो वायुः स च संवर्तकोऽनलः ॥ ७२ ॥ इसके बाद वह अमंगलकारी प्रचण्ड वायु और वह संवर्तक अग्नि बाईस हजार योजन तकके लोगोंको भस्म कर डालती है ॥ ७२ ॥ सदेवासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम् । ततो दहति दीप्तः स सर्वमेव जगद् विभुः ॥ ७३ ॥ इस प्रकार सर्वत्र फैली हुई वह प्रज्वलित अग्नि देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग तथा राक्षसोंसहित सम्पूर्ण विश्वको भस्म कर डालती है ॥ ७३ ॥ ततो गजकुलप्रख्यास्तडिन्मालाविभूषिताः । उत्तिष्ठन्ति महामेघा नभस्यद्भुतदर्शनाः ॥ ७४ ॥ इसके बाद आकाशमें महान् मेघोंकी घोर घटा घिर आती है, जो अद्भुत दिखायी देता है। उनमेंसे प्रत्येक मेघ-समूह हाथियोंके झुंडकी भाँति विशालकाय और श्यामवर्ण तथा बिजलीकी मालाओंसे विभूषित होता है ॥ ७४ ॥ केचिन्नीलोत्पलश्यामाः केचित् कुमुदसंनिभाः । केचित् किञ्जल्कसंकाशाः केचित् पीताः पयोधराः ॥ ७५ ॥ केचिद्धारिद्रसंकाशाः कारण्डवनिभास्तथा । केचित् कमलपत्राभाः केचिद्धिङ्गुलसप्रभाः ॥ ७६ ॥ कुछ बादल नील कमलके समान श्याम और कुछ कुमुद-कुसुमके समान सफेद होते हैं। कुछ जलधरोंकी कान्ति केसरोंके समान दिखायी देती है। कुछ मेघ हल्दीके सदृश पीले