महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1293, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंवेशयित्वा नश्यन्ति वायुवेगपराहताः ॥ ८४ ॥ तत्पश्चात् समस्त आकाशको घेरकर सब ओर फैले हुए वे मेघ वायुके प्रचण्ड वेगसे छिन्न-भिन्न होकर सहसा अदृश्य हो जाते हैं ॥ ८४ ॥ ततस्तं मारुतं घोरं स्वयम्भूर्मनुजाधिप । आदिः पद्मालयो देवः पीत्वा स्वपिति भारत ॥ ८५ ॥ नरेश्वर! इसके बाद कमलमें निवास करनेवाले आदिदेव स्वयं ब्रह्माजी उस भयंकर वायुको पीकर सो जाते हैं ॥ ८५ ॥ तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे । नष्टे देवासुरगणे यक्षराक्षसवर्जिते ॥ ८६ ॥ निर्मनुष्ये महीपाल निःश्वापदमहीरुहे । अनन्तरिक्षे लोकेऽस्मिन् भ्रमाम्येकोऽहमाहतः ॥ ८७ ॥ इस प्रकार चराचर प्राणियों, देवताओं तथा असुर आदिके नष्ट हो जानेपर यक्ष, राक्षस, मनुष्य, हिंसक जीव, वृक्ष तथा अन्तरिक्षसे शून्य उस घोर एकार्णवमय जगत्में मैं अकेला ही इधर-उधर मारा-मारा फिरता हूँ ॥ ८६-८७ ॥ एकार्णवे जले घोरे विचरन् पार्थिवोत्तम । अपश्यन् सर्वभूतानि वैक्लव्यमगमं ततः ॥ ८८ ॥ नृपश्रेष्ठ! एकार्णवके उस भयंकर जलमें विचरते हुए जब मैंने किसी भी प्राणीको नहीं देखा, तब मुझे बड़ी व्याकुलता हुई ॥ ८८ ॥ ततः सुदीर्घं गत्वाहं प्लवमानो नराधिप । श्रान्तः क्वचिन्न शरणं लभाम्यहमतन्द्रितः ॥ ८९ ॥ नरेश्वर! उस समय आलस्यशून्य होकर सुदीर्घकाल-तक तैरता हुआ मैं दूर जाकर बहुत थक गया। परंतु कहीं भी मुझे कोई आश्रय नहीं मिला ॥ ८९ ॥ ततः कदाचित् पश्यामि तस्मिन् सलिलसंचये । न्यग्रोधं सुमहन्तं वै विशालं पृथिवीपते ॥ ९० ॥ राजन्! तदनन्तर एक दिन एकार्णवकी उस अगाध जलराशिमें मैंने एक बहुत विशाल बरगदका वृक्ष देखा ॥ ९० ॥ शाखायां तस्य वृक्षस्य विस्तीर्णायां नराधिप । पर्यङ्के पृथिवीपाल दिव्यास्तरणसंस्कृते ॥ ९१ ॥ उपविष्टं महाराज पद्मेन्दुसदृशाननम् । फुल्लपद्मविशालाक्षं बालं पश्यामि भारत ॥ ९२ ॥ नराधिप! उस वृक्षकी चौड़ी शाखापर एक पलंग था, जिसके ऊपर दिव्य बिछौने बिछे हुए थे। महाराज! उस पलंगपर एक सुन्दर बालक बैठा दिखायी दिया, जिसका मुख