भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1307, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1307

ब्रह्मर्षे! मैं शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाला विश्वात्मा नारायण हूँ, सहस्र युगके अन्तमें जो प्रलय होता है वह जबतक रहता है, तबतक सब प्राणियोंको (महानिद्रारूप मायासे) मोहित करके मैं (जलमें) शयन करता हूँ। मुनिश्रेष्ठ! यद्यपि मैं बालक नहीं हूँ, तो भी जबतक ब्रह्मा नहीं जागते, तबतक सदा इसी प्रकार बालकरूप धारण करके यहाँ रहता हूँ॥ ४०-४१ ½ ॥

मया च दत्तो विप्राग्र्य वरस्ते ब्रह्मरूपिणा ॥ ४२ ॥ असकृत् परितुष्टेन विप्रर्षिगणपूजित । सर्वमेकार्णवं दृष्ट्वा नष्टं स्थावरजङ्गमम् ॥ ४३ ॥ विकलवोऽसि मया ज्ञातस्ततस्ते दर्शितं जगत् । अभ्यन्तरं शरीरस्य प्रविष्टोऽसि यदा मम ॥ ४४ ॥ दृष्ट्वा लोकं समस्तं च विस्मितो नावबुध्यसे । ततोऽसि वक्त्राद् विप्रर्षे द्रुतं निःसारितो मया ॥ ४५ ॥

विप्रशिरोमणे! तुम ब्रह्मर्षियोंद्वारा पूजित हो। मैंने ही ब्रह्मारूपसे तुम्हारे ऊपर बार-बार संतुष्ट हो तुम्हें अभीष्ट वर प्रदान किया है। मैंने समझ लिया था कि तुम सम्पूर्ण चराचर जगत्‌को नष्ट तथा एकार्णवमें निमग्न हुआ देखकर व्याकुल हो रहे हो। इसीलिये तुम्हें पुनः जगत्‌का दर्शन कराया है। ब्रह्मर्षे! जब तुम मेरे शरीरके भीतर प्रविष्ट हुए थे और समस्त संसारको देखकर विस्मय-विमुग्ध हो फिर सचेत नहीं हो पा रहे थे, तब मैंने तुरंत तुम्हें मुखसे बाहर निकाल दिया था ॥ ४२—४५ ॥

आख्यातस्ते मया चात्मा दुर्ज्ञेयो हि सुरासुरैः ॥ ४६ ॥ यावत् स भगवान् ब्रह्मा न बुध्येत महातपाः । तावत् त्वमिह विप्रर्षे विश्रब्धश्चर वै सुखम् ॥ ४७ ॥

ब्रह्मर्षे! इस प्रकार मैंने तुम्हें अपने स्वरूपका उपदेश किया है, जिसका जानना देवता और असुरोंके लिये भी कठिन है। जबतक महातपस्वी भगवान् ब्रह्माका जागरण न हो, तबतक तुम श्रद्धा और विश्वासपूर्वक सुखसे विचरते रहो ॥ ४६-४७ ॥

ततो विबुद्धे तस्मिंस्तु सर्वलोकपितामहे । एकीभूतो हि स्रक्ष्यामि शरीराणि द्विजोत्तम ॥ ४८ ॥

द्विजश्रेष्ठ! सर्वलोकपितामह ब्रह्माके जागनेपर मैं उनसे एकीभूत हो समस्त शरीरोंकी सृष्टि करूँगा ॥ ४८ ॥

आकाशं पृथिवीं ज्योतिर्वायुं सलिलमेव च । लोके यच्च भवेच्छेषमिह स्थावरजङ्गमम् ॥ ४९ ॥

आकाश, पृथ्वी, अग्नि, वायु और जलका तथा इस संसारमें जो अन्य चराचर वस्तुएँ अवशिष्ट हैं, उन सबका निर्माण करूँगा ॥ ४९ ॥

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