भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 132

नैनमैच्छत् तदाख्यातुमनुक्रोशादनिन्दिता ।। १०३ ।। मनस्विनी एवं अनिन्दिता हिडिम्बाने स्नेहयुक्त हृदयके कारण दयावश यह क्रूरतापूर्ण संदेश भीमसेनसे कहना उचित न समझा ।। १०३ ।। स नादान् विनदन् घोरान् राक्षसः पुरुषादकः । अभ्यद्रवत वेगेन भीमसेनं तदा किल ।। १०४ ।। इतनेहीमें वह नरभक्षी राक्षस घोर गर्जना करता हुआ बड़े वेगसे भीमसेनकी ओर दौड़ा ।। १०४ ।। तमभिद्रुत्य संक्रुद्धो वेगेन महता बली । अगृह्णात् पाणिना पाणिं भीमसेनस्य राक्षसः ।। १०५ ।। इन्द्राशनिसमस्पर्शं वज्रसंहननं दृढम् । संहत्य भीमसेनाय व्याक्षिपत् सहसा करम् ।। १०६ ।। क्रोधमें भरे हुए उस बलवान् राक्षसने बड़े वेगसे निकट जाकर अपने हाथसे भीमसेनका हाथ पकड़ लिया। भीमसेनके हाथका स्पर्श इन्द्रके वज्रके समान था। उनका शरीर भी वैसा ही सुदृढ़ था। राक्षसने भीमसेनसे भिड़कर उनके हाथको सहसा झटक दिया ।। १०५-१०६ ।। गृहीतं पाणिना पाणिं भीमसेनस्य रक्षसा । नामृष्यत महाबाहुस्तत्राक्रुध्यद् वृकोदरः ।। १०७ ।। राक्षसने भीमसेनके हाथको अपने हाथसे पकड़ लिया; यह बात महाबाहु भीमसेन नहीं सह सके। वे वहीं कुपित हो गये ।। १०७ ।। तदाऽऽसीत् तुमुलं युद्धं भीमसेनहिडिम्बयोः । सर्वास्त्रविदुषोर्घोरं वृत्रवासवयोरिव ।। १०८ ।। उस समय सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता भीमसेन और हिडिम्बमें इन्द्र और वृत्रासुरके समान भयानक एवं घमासान युद्ध होने लगा ।। १०८ ।। विक्रीड्य सुचिरं भीमो राक्षसेन सहानघ । निजघान महावीर्यस्तं तदा निर्बलं बली ।। १०९ ।। निष्पाप श्रीकृष्ण! महापराक्रमी और बलवान् भीमसेनने उस राक्षसके साथ बहुत देरतक खिलवाड़ करके उसके निर्बल हो जानेपर उसे मार डाला ।। १०९ ।। हत्वा हिडिम्बं भीमोऽथ प्रस्थितो भ्रातृभिः सह । हिडिम्बामग्रतः कृत्वा यस्यां जातो घटोत्कचः ।। ११० ।। इस प्रकार हिडिम्बको मारकर हिडिम्बाको आगे किये भीमसेन अपने भाइयोंके साथ आगे बढ़े। उसी हिडिम्बासे घटोत्कचका जन्म हुआ ।। ११० ।। ततः सम्प्राद्रवन् सर्वे सह मात्रा परंतपाः । एकचक्रामभिमुखाः संवृता ब्राह्मणव्रजैः ।। १११ ।।