भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1330, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1330

‘उसे सुनकर राजा सोचने लगे कि ‘यहाँ मनुष्योंकी गति तो नहीं दिखायी देती। फिर यह किसके गीतका शब्द सुनायी देता है’ ।। ८ ।।

अथापश्यत् कन्यां परमरूपदर्शनीयां पुष्पाण्यवचिन्वन्तीं गायन्तीं च। अथ सा राज्ञः समीपे पर्यक्रामत् ।। ९ ।।

‘इतनेहीमें उनकी दृष्टि एक कन्यापर पड़ी, जो अपने परम सुन्दर रूपके कारण देखने ही योग्य थी। वह वनके फूल चुनती हुई गीत गा रही थी। धीरे-धीरे भ्रमण करती हुई वह राजाके समीप आ गयी ।। ९ ।।

तामब्रवीद् राजा कस्यासि भद्रे का वा त्वमिति। सा प्रत्युवाच कन्याऽस्मीति तां राजोवाचार्थी त्वयाहमिति ।। १० ।।

‘तब राजाने उससे पूछा—‘कल्याणी! तुम कौन और किसकी हो?’ उसने उत्तर दिया—‘मैं कन्या हूँ—अभी मेरा विवाह नहीं हुआ है।’ तब राजाने उससे कहा—‘भद्रे! मैं तुझे चाहता हूँ’ ।। १० ।।

अथोवाच कन्या समयेनाहं शक्या त्वया लब्धुं नान्यथेति राजा तां समयमपृच्छत्। कन्योवाच नोदकं मे दर्शयितव्यमिति ।। ११ ।।

‘कन्या बोली’ तुम मुझे एक शर्तके साथ पा सकते हो अन्यथा नहीं।’ राजाने उससे वह शर्त पूछी। कन्याने कहा—‘मुझे कभी जलका दर्शन न कराना’ ।। ११ ।।

स राजा तां बाढमित्युक्त्वा तामुपयेमे कृतोद्वाहश्च राजा परीक्षित् क्रीडमानो मुदा परमया युक्तस्तूष्णीं सङ्गम्य तया सहास्ते ।। १२ ।।

‘तब राजाने उससे ‘बहुत अच्छा’ कहकर उससे (गान्धर्व) विवाह किया। विवाहके पश्चात् राजा परीक्षित् अत्यन्त आनन्दपूर्वक उसके साथ क्रीड़ा-विहार करने लगे और एकान्तमें मिलकर उसके साथ चुपचाप बैठे रहे ।। १२ ।।

ततस्तत्रैवासीने राजनि सेनान्वगच्छत् ।। १३ ।।

‘राजा अभी वहीं बैठे थे, इतनेहीमें उनकी सेना आ पहुँची ।। १३ ।।

सा सेनोपविष्टं राजानं परिवार्थ्यातिष्ठत्। पर्याश्वस्तश्च राजा तयैव सह शिबिकया प्रायादव-घोटितया स स्वं नगरमनुप्राप्य रहसि तया सहास्ते ।। १४ ।।

‘वह सेना अपने बैठे हुए राजाको चारों ओरसे घेरकर खड़ी हो गयी। अच्छी तरह सुस्ता लेनेके पश्चात् राजा एक साफ-सुथरी चिकनी पालकीमें उसीके साथ बैठकर अपने नगरको चल दिये और वहाँ पहुँचकर उस नवविवाहिता सुन्दरीके साथ एकान्तवास करने लगे ।। १४ ।।

तत्राभ्याशस्थोऽपि कश्चिन्नापश्यदथ प्रधानामा-त्योऽभ्याशचरास्तस्य स्त्रियोऽपृच्छत् ।। १५ ।।

‘वहाँ निकट होते हुए भी कोई उनका दर्शन नहीं कर पाता था। तब एक दिन प्रधान मन्त्रीने राजाके पास रहनेवाली स्त्रियोंसे पूछा— ।। १५ ।।

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