महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1332, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतां स मृगयमाणो राजा नापश्यद् वापीमथ निःस्राव्य मण्डूकं श्वभ्रमुखे दृष्ट्वा क्रुद्ध आज्ञापयामास स राजा ॥ २३ ॥
सर्वत्र मण्डूकवधः क्रियतामिति यो मयार्थी स मां मृतमण्डूकोपायनमादायोपतिष्ठेदिति ॥ २४ ॥
'राजाने उस वापीमें रानीकी बहुत खोज की, परंतु वह कहीं दिखायी न दी। तब उन्होंने बावलीका सारा जल निकलवा दिया। इसके बाद एक बिलके मुँहपर कोई मेढक दीख पड़ा। इससे राजाको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने आज्ञा दे दी कि 'सर्वत्र मेढकोंका वध किया जाय। जो मुझसे मिलना चाहे, वह मरे हुए मेढकका ही उपहार लेकर मेरे पास आवे' ॥ २३-२४ ॥
अथ मण्डूकवधे घोरे क्रियमाणे दिक्षु सर्वासु मण्डूकान् भयमाविवेश । ते भीता मण्डूकराज्ञे यथावृत्तं न्यवेदयन् ॥ २५ ॥
'इस आज्ञाके अनुसार चारों ओर मेढकोंका भयंकर संहार आरम्भ हो गया। इससे सब दिशाओंके मेढकोंके मनमें भय समा गया। वे डरकर मण्डूकराजके पास गये और उनसे सब वृत्तान्त ठीक-ठीक बता दिया ॥ २५ ॥
ततो मण्डूकराट् तापसवेषधारी राजानमभ्य-गच्छदुपैत्य चैनमुवाच ॥ २६ ॥
'तब मण्डूकराज तपस्वीका वेष धारण करके राजाके पास गया और निकट पहुँचकर उससे इस प्रकार बोला— ॥ २६ ॥
मा राजन् क्रोधवशं गमः प्रसादं कुरु नार्हसि मण्डूकानामपराधिनां वधं कर्तुमिति । श्लोकौ चात्र भवतः— ॥ २७ ॥
'राजन्! आप क्रोधके वशीभूत न हों। हमपर कृपा करें। निरपराध मेढकोंका वध न करावें।' इस विषयमें ये दो श्लोक भी प्रसिद्ध हैं— ॥ २७ ॥
मा मण्डूकान् जिघांस त्वं
कोपं संधारयाच्युत ।
प्रक्षीयते धनोद्रेको
जनानामविजानताम् ॥ २८ ॥
अच्युत! आप मेढकोंको मारनेकी इच्छा न करें। अपने क्रोधको रोकें; क्योंकि अविवेकसे काम लेनेवाले मनुष्योंके धनकी वृद्धि नष्ट हो जाती है ॥ २८ ॥
प्रतिजानीहि नैतांस्त्वं
प्राप्य क्रोधं विमोक्ष्यसि ।
अलं कृत्वा तवाधर्मं
मण्डूकैः किं हतैर्हि ते ॥ २९ ॥
'प्रतिज्ञा करें कि इन मेढकोंको पाकर आप क्रोध नहीं करेंगे; यह अधर्म करनेसे आपको क्या लाभ है? मण्डूकोंकी हत्यासे आपको क्या मिलेगा?' ॥ २९ ॥