भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1335, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1335

‘तब पिता मण्डूकराजने अपनी पुत्री सुशोभना महाराज परीक्षित्‌को समर्पित कर दी और उससे कहा—‘बेटी! सदा राजाकी सेवा करती रहना।’ ऐसा कहकर मण्डूकराजने जब अपनी पुत्रीके अपराधको याद किया, तब उसे क्रोध हो आया और उसने उसे शाप देते हुए कहा—‘अरी! तूने बहुत-से राजाओंको धोखा दिया है, इसलिये तेरी संतानें ब्राह्मणविरोधी होंगी; क्योंकि तू बड़ी झूठी है’ ।। ३४-३५ ।।

स च राजा तामुपलभ्य तस्यां सुरतगुण-निबद्धहृदयो लोकत्रयैश्वर्यमिवोपलभ्य हर्षेण बाष्प-कलया वाचा प्रणिपत्याभिपूज्य मण्डूकराजमब्रवीद-नुगृहीतोऽस्मीति ।। ३६ ।।

‘सुशोभनाके रतिकलासम्बन्धी गुणोंने राजाके मनको बाँध लिया था। वे उसे पाकर ऐसे प्रसन्न हुए, मानो उन्हें तीनों लोकोंका राज्य मिल गया हो। उन्होंने आनन्दके आँसू बहाते हुए मण्डूकराजको प्रणाम किया और उसका यथोचित सत्कार करते हुए हर्षगदगद वाणीमें कहा—‘मण्डूकराज! तुमने मुझपर बड़ी कृपा की है’ ।।

स च मण्डूकराजो दुहितरमनुज्ञाप्य यथागतमगच्छत् ।। ३७ ।।

‘तत्पश्चात् कन्यासे विदा लेकर मण्डूकराज जैसे आया था, वैसे ही अपने स्थानको चला गया ।। ३७ ।।

अथ कस्यचित् कालस्य तस्यां कुमारास्त्रय-स्तस्य राज्ञः सम्बभूवुः शलो दलो बलश्चेति । तत-स्तेषां ज्येष्ठं शलं समये पिता राज्येऽभिषिच्य तपसि धृतात्मा वनं जगाम ।। ३८ ।।

‘कुछ कालके पश्चात् सुशोभनाके गर्भसे राजा परीक्षित्‌के तीन पुत्र हुए—शल, दल और बल। इनमें शल सबसे बड़ा था। समय आनेपर पिताने शलका राज्याभिषेक करके स्वयं तपस्यामें मन लगाये तपोवनको प्रस्थान किया ।। ३८ ।।

अथ कदाचिच्छलो मृगयामनुचरन् मृगमासाद्य रथेनान्वधावत् ।। ३९ ।।
सूतं चोवाच शीघ्रं मां वहस्वेति स तथोक्तः सूतो राजानमब्रवीत् ।। ४० ।।
न क्रियतामनुबन्धो नैष शक्यस्त्वया मृगोऽयं ग्रहीतुं यद्यपि ते रथे युक्तौ वाम्यौ स्यातामिति । ततोऽब्रवीद् राजा सूतमाचक्ष्व मे वाम्यौ हन्मि च त्वामिति । स एवमुक्तो राजभयभीतः सूतो वामदेव-शापभीतश्च सन् नाचख्यौ राज्ञे । ततः पुनः स राजा खड्गमुद्यम्य शीघ्रं कथयस्वेति तमाह हनिष्ये त्वामिति । स तदाऽऽह राजभयभीतः सूतो वामदेवस्याश्वौ वाम्यौ मनोजवाविति ।। ४१ ।।

‘तदनन्तर एक दिन महाराज शल शिकार खेलनेके लिये वनको गये। वहाँ उन्होंने एक हिंसक पशुको सामने पाकर रथके द्वारा ही उसका पीछा किया और सारथिसे कहा—‘शीघ्र मुझे मृगके निकट पहुँचाओ’। उनके ऐसा कहनेपर सारथि बोला—‘महाराज! आप इस पशुको पकड़नेका आग्रह न करें। यह आपकी पकड़में नहीं आ सकता। यदि आपके रथमें दोनों वाम्य घोड़े जुते होते, तब आप इसे पकड़ लेते।’ यह सुनकर राजाने सूतसे पूछा

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