महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1337, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें‘मन-ही-मन सोच-विचार करते हुए जब एक मास पूरा हो गया, तब वे अपने शिष्यसे बोले—‘आत्रेय! जाकर राजासे कहो कि यदि काम पूरा हो गया हो तो गुरुजीके दोनों वाम्य अश्व लौटा दीजिये।’ शिष्यने जाकर राजासे यही बात दोहरायी। तब राजाने उसे उत्तर देते हुए कहा—‘यह सवारी राजाओंके योग्य है। ब्राह्मणोंको ऐसे रत्न रखनेका अधिकार नहीं है। भला, ब्राह्मणोंको घोड़े लेकर क्या करना है? अब आप सकुशल पधारिये’ ॥ ४५-४६ ॥
स गत्वैतदुपाध्यायायाचष्ट तच्छ्रुत्वा वचनमप्रियं वामदेवः क्रोधपरीतात्मा स्वयमेव राजानभिगम्या-श्वार्थमचोदयन्न चाददद् राजा ॥ ४७ ॥
‘शिष्यने लौटकर ये सारी बातें उपाध्यायसे कहीं। वह अप्रिय वचन सुनकर वामदेव मन-ही-मन क्रोधसे जल उठे और स्वयं ही उस राजाके पास जाकर उन्हें घोड़े लौटा देनेके लिये कहा। परंतु राजाने वे घोड़े नहीं दिये’ ॥ ४७ ॥
वामदेव उवाच
प्रयच्छ वाम्यौ मम पार्थिव त्वं कृतं हि ते कार्यमाभ्यामशक्यम् । मा त्वा वधीद् वरुणो घोरपाशै- र्ब्रह्मक्षत्रस्यान्तरे वर्तमानम् ॥ ४८ ॥
**तब वामदेवने कहा—**राजन्! मेरे वाम्य अश्वोंको अब मुझे लौटा दो। निश्चय ही उन घोड़ोंद्वारा तुम्हारा असाध्य कार्य पूरा हो गया है। इस समय तुम ब्राह्मण और क्षत्रियके बीचमें विद्यमान हो। कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी असत्यवादिताके कारण राजा वरुण तुम्हें अपने भयंकर पाशोंसे बाँध लें ॥ ४८ ॥
राजोवाच
अनड्वाहौ सुव्रतौ साधु दान्ता- वेतद् विप्राणां वाहनं वामदेव । ताभ्यां याहि त्वं तत्र कामो महर्षे छन्दांसि वै त्वादृशं संवहन्ति ॥ ४९ ॥
**राजा बोले—**वामदेवजी! ये दो अच्छे स्वभावके सीखे-सिखाये हृष्ट-पुष्ट बैल हैं, जो गाड़ी खींच सकते हैं; ये ही ब्राह्मणोंके लिये उचित वाहन हो सकते हैं। अतः महर्षे! इन्हींको गाड़ीमें जोतकर आप जहाँ चाहें जायें। आप-जैसे महात्माका भार तो वेदमन्त्र ही वहन करते हैं ॥ ४९ ॥
वामदेव उवाच
छन्दांसि वै मादृशं संवहन्ति