भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 134

पापकर्मोंमें लगे हुए अत्यन्त दुर्बल पापी शत्रुओंके दिये हुए ऐसे-ऐसे दुःख मैं सह रही हूँ और दीर्घकालसे चिन्ताकी आगमें जल रही हूँ ॥ ११९ ॥ कुले महति जातास्मि दिव्येन विधिना किल । पाण्डवानां प्रिया भार्या स्नुषा पाण्डोर्महात्मनः ॥ १२० ॥ यह प्रसिद्ध है कि मैं दिव्य विधिसे एक महान् कुलमें उत्पन्न हुई हूँ। पाण्डवोंकी प्यारी पत्नी और महाराज पाण्डुकी पुत्रवधू हूँ ॥ १२० ॥ कचग्रगमनुप्राप्ता सास्मि कृष्ण वरा सती । पञ्चानां पाण्डुपुत्राणां प्रेक्षतां मधुसूदन ॥ १२१ ॥ मधुसूदन श्रीकृष्ण! मैं श्रेष्ठ और सती-साध्वी होती हुई भी इन पाँचों पाण्डवोंके देखते-देखते केश पकड़कर घसीटी गयी ॥ १२१ ॥ इत्युक्त्वा प्रारुदत् कृष्णा मुखं प्रच्छाद्य पाणिना । पद्मकोशप्रकाशेन मृदुना मृदुभाषिणी ॥ १२२ ॥ ऐसा कहकर मृदुभाषिणी द्रौपदी कमलकोशके समान कान्तिमान् एवं कोमल हाथसे अपना मुँह ढककर फूट-फूटकर रोने लगी ॥ १२२ ॥ स्तनावपतितौ पीनौ सुजातौ शुभलक्षणौ । अभ्यवर्षत पाञ्चाली दुःखजैरश्रुबिन्दुभिः ॥ १२३ ॥ पांचालराजकुमारी कृष्णा अपने कठोर, उभरे हुए, शुभलक्षण तथा सुन्दर स्तनोंपर दुःखजनित अश्रुबिन्दुओंकी वर्षा करने लगी ॥ १२३ ॥ चक्षुषी परिमार्जन्ती निःश्वसन्ती पुनः पुनः । बाष्पपूर्णेन कण्ठेन क्रुद्धा वचनमब्रवीत् ॥ १२४ ॥ कुपित हुई द्रौपदी बार-बार सिसकती और आँसू पोंछती हुई आँसूभरे कण्ठसे बोली — ॥ १२४ ॥ नैव मे पतयः सन्ति न पुत्रा न च बान्धवाः । न भ्रातरो न च पिता नैव त्वं मधुसूदन ॥ १२५ ॥ 'मधुसूदन! मेरे लिये न पति हैं, न पुत्र हैं, न बान्धव हैं, न भाई हैं, न पिता हैं और न आप ही हैं ॥ १२५ ॥ ये मां विप्रकृतां क्षुद्रैरुपेक्षध्वं विशोकवत् । न च मे शाम्यते दुःखं कर्णो यत् प्राहसत् तदा ॥ १२६ ॥ 'क्योंकि आप सब लोग, नीच मनुष्योंद्वारा जो मेरा अपमान हुआ था, उसकी उपेक्षा कर रहे हैं, मानो इसके लिये आपके हृदयमें तनिक भी दुःख नहीं है। उस समय कर्णने जो मेरी हँसी उड़ायी थी, उससे उत्पन्न हुआ दुःख मेरे हृदयसे दूर नहीं होता है ॥ १२६ ॥ चतुर्भिः कारणैः कृष्ण त्वया रक्ष्यास्मि नित्यशः । सम्बन्धाद् गौरवात् सख्यात् प्रभुत्वेनैव केशव ॥ १२७ ॥