महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइन्द्र उवाच
पुनरेव महाभाग देवर्षिगणसेवित ॥ २६ ॥
समाख्याहि मम ब्रह्मन् किं सुखं चिरजीविनाम् ।
इन्द्रने पूछा— महाभाग! देवता तथा ऋषियोंके समुदाय आपकी सेवामें उपस्थित रहते हैं। ब्रह्मन्! अब मुझसे फिर यह बताइये कि चिरजीवी मनुष्योंको क्या सुख मिलता है? ॥ २६ ½ ॥
बक उवाच
अष्टमे द्वादशे वापि शाकं यः पचते गृहे ॥ २७ ॥
कुमित्रान्यनपाश्रित्य किं वै सुखतरं ततः ।
यत्राहानि न गण्यन्ते नैनमाहुर्महाशनम् ॥ २८ ॥
बकने कहा— जो दिनके आठवें या बारहवें भागमें अपने घरपर भोजनके लिये केवल शाक पका लेता है परंतु कुमित्रोंकी शरणमें नहीं जाता, उस पुरुषको जो सुख प्राप्त है, उससे बढ़कर सुख और क्या हो सकता है? जहाँ दिन नहीं गिने जाते—जहाँ प्रतिदिन अन्नकी प्राप्तिके लिये चिन्ता नहीं करनी पड़ती; वही सुखी है। उसे लोग अधिक खानेवाला अथवा पेटू नहीं कहते हैं ॥ २७-२८ ॥
अपि शाकं पचानस्य सुखं वै मघवन् गृहे ।
अर्जितं स्वेन वीर्येण नाप्यपाश्रित्य कञ्चन ॥ २९ ॥
इन्द्र! जो अपने पराक्रमसे उपार्जन करके घरमें केवल शाक बनाकर खाता है, परंतु दूसरे किसीका सहारा नहीं लेता, उसे ही सुख है ॥ २९ ॥
फलशाकमपि श्रेयो भोक्तुं ह्यकृपणं गृहे ।
परस्य तु गृहे भोक्तुः परिभूतस्य नित्यशः ॥ ३० ॥
सुमृष्टमपि न श्रेयो विकल्पोऽयमतः सताम् ।
श्ववत् कीलालपो यस्तु परान्नं भोक्तुमिच्छति ॥ ३१ ॥
धिगस्तु तस्य तद् भुक्तं कृपणस्य दुरात्मनः ।
दूसरेके सामने दीनता न दिखाकर अपने घरमें फल और शाक खाकर रहना अच्छा है। परंतु दूसरेके घरमें सदा तिरस्कार सहकर मीठे पकवान खाना भी अच्छा नहीं है; अतः दूसरेके आश्रित रहकर जीवन-निर्वाह करनेके सम्बन्धमें साधु पुरुषोंका सदासे ही विरोध रहा है। जो पराया अन्न खाना चाहता है, वह कुत्तेकी भाँति खून चाटता है। उस दुरात्मा और कृपणके वैसे भोजनको धिक्कार है ॥ ३०-३१ ½ ॥
यो दत्त्वातिथिभूतेभ्यः पितृभ्यश्च द्विजोत्तमः ॥ ३२ ॥
शिष्टान्यन्नानि यो भुङ्क्ते किं वै सुखतरं ततः ।
अतो मृष्टतरं नान्यत् पूतं किञ्चिच्छतक्रतो ॥ ३३ ॥