महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1356, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंषण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः
सेदुक और वृषदर्भका चरित्र
वैशम्पायन उवाच
भूय एव महाभाग्यं कथ्यतामित्यब्रवीत् पाण्डवः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने मार्कण्डेयजीसे पुनः यह अनुरोध किया—'भगवन्! फिर मुझे क्षत्रियोंका माहात्म्य सुनाइये' ॥ १ ॥
अथाचष्ट मार्कण्डेयो महाराज वृषदर्भसेदुकनामानौ राजानौ नीतिमार्गरतावस्त्रोपास्त्रकृतिनौ ॥ २ ॥
तब मार्कण्डेयजीने कहा—'महाराज! पूर्वकालमें वृषदर्भ और सेदुक ये दो राजा थे। दोनोंही नीतिके मार्गपर चलनेवाले और अस्त्र तथा उपास्त्रोंकी विद्यामें निपुण थे ॥ २ ॥
सेदुको वृषदर्भस्य बालस्यैव उपांशुव्रतमभ्यजानात् कुप्यमदेयं ब्राह्मणस्य ॥ ३ ॥
'वृषदर्भने बचपनसे ही एक गुप्त व्रत ले रखा था कि 'ब्राह्मणको सोना-चाँदीके सिवा और कुछ नहीं देना चाहिये (तात्पर्य यह कि उसे सुवर्ण तथा रजत ही प्रदान करना चाहिये)'। उनके इस व्रतको सेदुक जानते थे ॥ ३ ॥
अथ तं सेदिकं ब्राह्मणः कश्चिद् वेदाध्ययनसम्पन्न आशिषं दत्त्वा गुर्वर्थी भिक्षितवान् ॥ ४ ॥ अश्वसहस्रं मे भवान् ददात्विति तं सेदुको ब्राह्मणमब्रवीत् ॥ ५ ॥ नास्ति सम्भवो गुर्वर्थं दातुमिति ॥ ६ ॥
'एक दिन कोई वेदाध्ययनसम्पन्न ब्राह्मण राजा सेदुकके पास आया और उन्हें आशीर्वाद देकर गुरु-दक्षिणाके लिये भिक्षा माँगता हुआ बोला—'राजन्! आप मुझे एक हजार घोड़े दीजिये।' तब सेदुकने उस ब्राह्मण-से कहा—'ब्रह्मन्! आपकी अभीष्ट गुरु-दक्षिणा देना मेरे लिये सम्भव नहीं है ॥ ४-६ ॥
स त्वं गच्छ वृषदर्भसकाशम् । राजा परम-धर्मज्ञो ब्राह्मण तं भिक्षस्व । स ते दास्यति तस्यैतदुपांशुव्रतमिति ॥ ७ ॥
'अतः आप वृषदर्भके पास चले जाइये। ब्राह्मण! राजा वृषदर्भ बड़े धर्मज्ञ हैं। आप उन्हींसे याचना कीजिये। वे आपकी अभीष्ट वस्तु अवश्य दे देंगे। यह उनका गुप्त नियम है' ॥ ७ ॥
अथ ब्राह्मणो वृषदर्भसकाशं गत्वा अश्वसहस्रमयाचत् । स राजा तं कशेनाताडयत् ॥ ८ ॥