भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1369

‘तुम्हीं यह सब खा जाओ।’ शिबिने उसी प्रकार मनको प्रसन्न रखते हुए ‘बहुत अच्छा’ कहकर ब्राह्मणकी आज्ञा स्वीकार की और उनका पूजन करके (सिरपर रखे हुए) ढक्कनको उघाड़कर वह सब खानेकी इच्छा की ॥ २२ ॥

अथास्य ब्राह्मणो हस्तमगृह्लात् । अब्रवीच्चैनं जितक्रोधोऽसि न ते किञ्चिदपरित्याज्यं ब्राह्मणार्थे ब्राह्मणोऽपि तं महाभागं सभाजयत् ॥ २३ ॥ ‘तब ब्राह्मणने उनका हाथ पकड़ लिया और कहा—‘राजन्! तुमने क्रोधको जीत लिया है। तुम्हारे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे तुम ब्राह्मणके लिये न दे सको।’ ऐसा कहकर ब्राह्मणने भी उन महाभाग नरेशका समादर किया ॥ २३ ॥

स ह्युद्वीक्षमाणः पुत्रमपश्यदग्रे तिष्ठन्तं देवकुमारमिव पुण्यगन्धान्वितमलङ्कृतं सर्वं च तमर्थं विधाय ब्राह्मणोऽन्तरधीयत ॥ २४ ॥ ‘राजाने जब आँख उठाकर देखा, तब उनका पुत्र आगे खड़ा था। वह देवकुमारकी भाँति दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित था। उसके शरीरसे पवित्र सुगन्ध निकल रही थी। ब्राह्मण-देवता सब वस्तुओंको पूर्ववत् ठीक करके अन्तर्धान हो गये ॥ २४ ॥

तस्य राजर्षेर्विधाता तेनैव वेषेण परीक्षार्थमागत इति तस्मिन्नन्तर्हिते अमात्या राजानमूचुः । किं प्रेप्सुना भवता इदमेवं जानता कृतमिति ॥ २५ ॥ साक्षात् विधाता ब्राह्मणके वेशमें राजर्षि शिबिकी परीक्षा लेने आये थे। उनके अन्तर्धान हो जानेपर राजाके मन्त्रियोंने उनसे पूछा—‘महाराज! आप क्या चाहते हैं? जिसके लिये सब कुछ जानते हुए भी ऐसा दुःसाहसपूर्ण कार्य किया है?’ ॥ २५ ॥

शिबिरुवाच

नैवाहमेतद् यशसे ददानि न चार्थहेतोर्न च भोगतृष्णया । पापैरनासेवित एष मार्ग इत्येवमेतत् सकलं करोमि ॥ २६ ॥ **शिबि बोले—**मैं यशके लिये यह दान नहीं देता। धनके लिये अथवा भोगकी लिप्सासे भी दान नहीं करता। यह धर्मात्माओंका मार्ग है। पापी मनुष्य इसपर नहीं चल सकते। ऐसा समझकर ही मैं यह सब कुछ करता रहता हूँ ॥ २६ ॥

सद्भिः सदाध्यासितं तु प्रशस्तं तस्मात् प्रशस्तं श्रयते मतिर्मे । एतन्महाभाग्यवरं शिबेस्तु तस्मादहं वेद यथावदेतत् ॥ २७ ॥ श्रेष्ठ पुरुष सदा जिस मार्गसे चले हैं, वही उत्तम मार्ग है। इसीलिये मेरी बुद्धि सदा उस उत्तम पथका ही आश्रय लेती है। यह है राजा शिबिकी सर्वश्रेष्ठ महिमा, जिसे मैं (अच्छी