महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 139, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्त्रियोऽक्षा मृगया पानमेतत् कामसमुत्थितम् । दुःखं चतुष्टयं प्रोक्तं यैर्नरो भ्रश्यते श्रियः ॥ ७ ॥ तत्र सर्वत्र वक्तव्यं मन्यन्ते शास्त्रकोविदाः । विशेषतश्च वक्तव्यं द्यूते पश्यन्ति तद्विदः ॥ ८ ॥ स्त्रियोंके प्रति आसक्ति, जूआ खेलना, शिकार खेलनेका शौक और मद्यपान—ये चार प्रकारके भोग कामनाजनित दुःख बताये गये हैं, जिनके कारण मनुष्य अपने धन-ऐश्वर्यसे भ्रष्ट हो जाता है। शास्त्रोंके निपुण विद्वान् सभी परिस्थितियोंमें इन चारोंको निन्दनीय मानते हैं; परंतु द्यूतक्रीड़ाको तो जूएके दोष जाननेवाले लोग विशेषरूपसे निन्दनीय समझते हैं॥ ७-८ ॥ एकाहाद् द्रव्यनाशोऽत्र ध्रुवं व्यसनमेव च । अभुक्तनाशश्चार्थानां वाक्पारुष्यं च केवलम् ॥ ९ ॥ एतच्चान्यच्च कौरव्य प्रसङ्गिकटुकोदयम् । द्यूते ब्रूयां महाबाहो समासाद्याम्बिकासुतम् ॥ १० ॥ जूएसे एक ही दिनमें सारे धनका नाश हो जाता है। साथ ही जूआ खेलनेसे उसके प्रति आसक्ति होनी निश्चित है। समस्त भोग-पदार्थोंका बिना भोगे ही नाश हो जाता है और बदलेमें केवल कटुवचन सुननेको मिलते हैं। कुरुनन्दन! ये तथा और भी बहुत-से दोष हैं, जो जूएके प्रसंगसे कटु परिणाम उत्पन्न करनेवाले हैं। महाबाहो! मैं धृतराष्ट्रसे मिलकर जूएके ये सभी दोष बतलाता ॥ ९-१० ॥ एवमुक्तो यदि मया गृह्णीयाद् वचनं मम । अनामयं स्याद् धर्मश्च कुरूणां कुरुवर्धन ॥ ११ ॥ कुरुवर्धन! मेरे इस प्रकार समझाने-बुझानेपर यदि वे मेरी बात मान लेते तो कौरवोंमें शान्ति बनी रहती और धर्मका भी पालन होता ॥ ११ ॥ न चेत् स मम राजेन्द्र गृह्णीयान्मधुरं वचः । पथ्यं च भरतश्रेष्ठ निगृह्णीयां बलेन तम् ॥ १२ ॥ राजेन्द्र! भरतश्रेष्ठ! यदि वे मेरे मधुर एवं हितकर वचनको सुनकर उसे न मानते तो मैं उन्हें बलपूर्वक रोक देता ॥ १२ ॥ अथैनमपनीतेन सुहृदो नाम दुर्हृदः । सभासदोऽनुवर्तेरंस्तांश्च हन्यां दुरोदरान् ॥ १३ ॥ यदि वहाँ सुहृदनामधारी शत्रु अन्यायका आश्रय ले इस धृतराष्ट्रका साथ देते तो मैं उन सभासद जुआरियोंको मार डालता ॥ १३ ॥ असांनिध्यं तु कौरव्य ममानर्तेष्वभूत् तदा । येनेदं व्यसनं प्राप्ता भवन्तो द्यूतकारितम् ॥ १४ ॥