भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1394

वदन्ति लोकेषु विशिष्टबुद्धयः ॥ १२९ ॥
त्रिलोकीमें दानसे बढ़कर शाश्वत पुण्यदायक कर्म दूसरा पहले कभी नहीं हुआ, अब कैसे हो सकता है? इसीलिये उत्तम बुद्धिवाले पुरुष संसारमें दानको ही सर्वोत्कृष्ट पुण्यकर्म बताते हैं ॥ १२९ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि दानमाहात्म्ये द्विशततमोऽध्यायः ॥ २०० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें दानमाहात्म्यविषयक दो सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०० ॥


* यहाँ जो पिता आदि गुरुजन, सेवक और स्त्रियोंको दिया दान व्यर्थ कहा है, इसका अभिप्राय यह है कि माता-पिता आदि गुरुजनोंकी सेवा करना तथा स्त्री और नौकरोंका पालन-पोषण करना तो मनुष्यका कर्तव्य ही है। अतः उनको देना तो अपने कर्तव्यका ही पालन है, इसलिये वह उनको देना दानकी श्रेणीमें नहीं है।