महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहाराज! राजा बृहदश्वने यथासमय अपने उत्तम धर्मात्मा शूरवीर पुत्र कुवलाश्वको राज्यपर अभिषिक्त कर दिया ।। ७ ।।
पुत्रसंक्रामितश्रीस्तु बृहदश्वो महीपतिः । जगाम तपसे धीमांस्तपोवनममित्रहा ॥ ८ ॥
शत्रुओंका संहार करनेवाले बुद्धिमान् राजा बृहदश्व राजलक्ष्मीका भार पुत्रपर छोड़कर स्वयं तपस्याके लिये तपोवनमें चले गये ।। ८ ।।
अथ शुश्राव राजर्षिं तमुत्तङ्को नराधिप । वनं सम्प्रस्थितं राजन् बृहदश्वं द्विजोत्तमः ॥ ९ ॥
राजन्! तदनन्तर द्विजश्रेष्ठ उत्तङ्कने यह सुना कि राजर्षि बृहदश्व वनको चले जा रहे हैं ।। ९ ।।
तमुत्तङ्को महातेजाः सर्वास्त्रविदुषां वरम् । न्यवारयदमेयात्मा समासाद्य नरोत्तमम् ॥ १० ॥
वे नरश्रेष्ठ नरेश सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके विद्वानोंमें सर्वोत्तम थे। विशाल हृदयवाले महातेजस्वी उत्तङ्कने उनके पास जाकर उन्हें वनमें जानेसे रोका और इस प्रकार कहा ।। १० ।।
उत्तङ्क उवाच
भवता रक्षणं कार्यं तत् तावत् कर्तुमर्हसि । निरुद्विग्ना वयं राजंस्त्वत्प्रसादाद् भवेमहि ॥ ११ ॥
**उत्तङ्क बोले—**महाराज! प्रजाकी रक्षा करना आपका कर्तव्य है। अतः पहले वही आपको करना चाहिये जिससे आपके कृपाप्रसादसे हमलोग निर्भय हो जायँ ।। ११ ।।