भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1432

द्विजश्रेष्ठ! बहुधा धर्मका स्वरूप सूक्ष्म ही देखा जाता है। तुम भी धर्मज्ञ, स्वाध्यायपरायण और पवित्र हो ॥ ४२ ॥ न तु तत्त्वेन भगवन् धर्मं वेत्सीति मे मतिः । यदि विप्र न जानीषे धर्मं परमकं द्विज ॥ ४३ ॥ धर्मव्याधं ततः पृच्छ गत्वा तु मिथिलां पुरीम् । भगवन्! तो भी मेरा विचार यह है कि तुम्हें धर्मका यथार्थ ज्ञान नहीं है। विप्रवर! यदि तुम परम धर्म क्या है, यह नहीं जानते तो मिथिलापुरीमें धर्मव्याधके पास जाकर पूछो ॥ ४३ ½ ॥ मातापितृभ्यां शुश्रूषुः सत्यवादी जितेन्द्रियः ॥ ४४ ॥ मिथिलायां वसेद् व्याधः स ते धर्मान् प्रवक्ष्यति । तत्र गच्छस्व भद्रं ते यथाकामं द्विजोत्तम ॥ ४५ ॥ मिथिलामें एक व्याध रहता है, जो माता-पिताका सेवक, सत्यवादी और जितेन्द्रिय है, वह तुम्हें धर्मका उपदेश करेगा। द्विजश्रेष्ठ! तुम अपनी रुचिके अनुसार वहीं जाओ, तुम्हारा मंगल हो ॥ ४४-४५ ॥ अत्युक्तमपि मे सर्वं क्षन्तुमर्हस्यनिन्दित । स्त्रियो ह्यवध्याः सर्वेषां ये च धर्मविदो जनाः ॥ ४६ ॥ अनिन्दनीय ब्राह्मण! यदि मेरे मुखसे कोई अनुचित बातें निकल गयी हों तो उन सबके लिये मुझे क्षमा करें; क्योंकि जो धर्मज्ञ पुरुष हैं, उन सबकी दृष्टिमें स्त्रियाँ अदण्डनीय हैं ॥ ४६ ॥

ब्राह्मण उवाच प्रीतोऽस्मि तव भद्रं ते गतः क्रोधश्च शोभने । उपालम्भस्त्वयात्युक्तो मम निःश्रेयसं परम् । स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि साधयिष्यामि शोभने ॥ ४७ ॥ (धन्या त्वमसि कल्याणि यस्यास्ते वृत्तमीदृशम् ।) ब्राह्मण बोला—शुभे! तुम्हारा भला हो। मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। मेरा सारा क्रोध दूर हो गया। तुमने जो उलाहना दिया है, वह अनुचित वचन नहीं, मेरे लिये परम कल्याणकारी है। शोभने! तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं जाऊँगा और अपना कार्यसाधन करूँगा। कल्याणि! तुम धन्य हो, जिसका सदाचार इतनी उच्चकोटिका है ॥ ४७ ॥

मार्कण्डेय उवाच तया विसृष्टो निर्गम्य स्वमेव भवनं ययौ । विनिन्दन् स स्वमात्मानं कौशिको द्विजसत्तमः ॥ ४८ ॥