भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1443, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1443

विप्रवर! लोभको ही पापोंका घर समझो। जिन्होंने अधिकतर शास्त्रोंका श्रवण नहीं किया है, वे लोभी मनुष्य ही पाप करनेका विचार रखते हैं ॥ ५८ ॥ अधर्मा धर्मरूपेण तृणैः कूपा इवावृताः । तेषां दमः पवित्राणि प्रलापा धर्मसंश्रिताः । सर्वं हि विद्यते तेषु शिष्टाचारः सुदुर्लभः ॥ ५९ ॥ तिनकेसे ढके हुए कुओंकी भाँति धर्मकी आड़में कितने ही अधर्म चल रहे हैं। धर्मात्माके वेशमें रहनेवाले इन अधार्मिक मनुष्योंमें इन्द्रिय-संयम, पवित्रता और धर्मसम्बन्धी चर्चा आदि सभी गुण तो होते हैं, परंतु उनमें शिष्टाचार (श्रेष्ठ पुरुषोंका-सा आचार-व्यवहार) अत्यन्त दुर्लभ है ॥ ५९ ॥

मार्कण्डेय उवाच

स तु विप्रो महाप्राज्ञो धर्मव्याधमपृच्छत । शिष्टाचारं कथमहं विद्यामिति नरोत्तम ॥ ६० ॥ **मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर परम बुद्धिमान् कौशिकने धर्मव्याधसे पूछा—'नरश्रेष्ठ! मुझे शिष्टाचारका ज्ञान कैसे हो? ॥ ६० ॥

एतदिच्छामि भद्रं ते श्रोतुं धर्मभृतां वर । त्वत्तो महामते व्याध तद् ब्रवीहि यथातथम् ॥ ६१ ॥ 'धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महामते व्याध! तुम्हारा भला हो, मैं ये सब बातें तुमसे सुनना चाहता हूँ। अतः यथार्थ रूपसे इनका वर्णन करो' ॥ ६१ ॥

व्याध उवाच

यज्ञो दानं तपो वेदाः सत्यं च द्विजसत्तम । पञ्चैतानि पवित्राणि शिष्टाचारेषु सर्वदा ॥ ६२ ॥ **व्याधने कहा—**द्विजश्रेष्ठ! यज्ञ, दान, तपस्या, वेदोंका स्वाध्याय और सत्यभाषण—ये पाँच पवित्र वस्तुएँ शिष्ट पुरुषोंके आचार-व्यवहारमें सदा देखी गयी हैं ॥ ६२ ॥

कामक्रोधौ वशे कृत्वा दम्भं लोभमनार्जवम् । धर्ममित्येव संतुष्टास्ते शिष्टाः शिष्टसम्मताः ॥ ६३ ॥ जो काम, क्रोध, लोभ, दम्भ और कुटिलताको वशमें करके केवल धर्मको ही अपनाकर संतुष्ट रहते हैं, वे शिष्ट कहलाते हैं और उन्हींका शिष्ट पुरुष आदर करते हैं ॥ ६३ ॥

न तेषां विद्यतेऽवृत्तं यज्ञस्वाध्यायशीलिनाम् । आचारपालनं चैव द्वितीयं शिष्टलक्षणम् ॥ ६४ ॥ वे निरन्तर यज्ञ और स्वाध्यायमें लगे रहते हैं। उनमें स्वेच्छाचार नहीं होता। सदाचारका पालन शिष्ट पुरुषोंका दूसरा लक्षण है ॥ ६४ ॥

गुरुशुश्रूषणं सत्यमक्रोधो दानमेव च ।

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