महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1448, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंगच्छन्तीह सुसंतुष्टा धर्मपन्थानमुत्तमम् । शिष्टाचारा महात्मानो येषां धर्मः सुनिश्चितः ॥ ९५ ॥ जो सर्वत्र दया करते हैं, जिनके हृदयमें करुणाकी अनुभूति होती है, वे श्रेष्ठ पुरुष इस लोकमें अत्यन्त संतुष्ट रहकर धर्मके उत्तम पथपर चलते हैं। जिन्होंने धर्मको अपनाये रखनेका दृढ़ निश्चय कर लिया है, वे ही महात्मा सदाचारी हैं ॥ ९४-९५ ॥ अनसूया क्षमा शान्तिः संतोषः प्रियवादिता । कामक्रोधपरित्यागः शिष्टाचारनिषेवणम् ॥ ९६ ॥ कर्म च श्रुतसम्पन्नं सतां मार्गमनुत्तमम् । दोषदृष्टिका अभाव, क्षमा, शान्ति, संतोष, प्रियभाषण और काम-क्रोधका त्याग, शिष्टाचारका सेवन और शास्त्रके अनुकूल कर्म करना—यह श्रेष्ठ पुरुषोंका अति उत्तम मार्ग है ॥ ९६ १/२ ॥ शिष्टाचारं निषेवन्ते नित्यं धर्ममनुव्रताः ॥ ९७ ॥ प्रज्ञाप्रासादारुह्य मुच्यन्ते महतो भयात् । प्रेक्षन्तो लोकवृत्तानि विविधानि द्विजोत्तम ॥ ९८ ॥ अतिपुण्यानि पापानि तानि द्विजवरोत्तम । द्विजश्रेष्ठ! जो धर्मात्मा पुरुष सदा शिष्टाचारका सेवन करते हैं और प्रज्ञारूपी प्रासादपर आरूढ़ हो भाँति-भाँतिके लोकचरित्रोंका निरीक्षण तथा अत्यन्त पुण्य एवं पापकर्मोंकी समीक्षा करते हैं, वे महान् भयसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ९७-९८ १/२ ॥ एतत् ते सर्वमाख्यातं यथाप्रज्ञं यथाश्रुतम् । शिष्टाचारगुणं ब्रह्मन् पुरस्कृत्य द्विजर्षभ ॥ ९९ ॥ ब्रह्मन्! विप्रवर! इस प्रकार शिष्टाचारके गुणोंके सम्बन्धमें मैंने जैसा जाना और सुना है, वह सब आपसे कह सुनाया है ॥ ९९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे सप्ताधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें ब्राह्मणव्याधसंवादविषयक दो सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०७ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/२ श्लोक मिलाकर कुल १०० १/२ श्लोक हैं)