भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1450

आत्ममांसप्रसादेन शिबिरौशीनरो नृपः । स्वर्गं सुदुर्गमं प्राप्तः क्षमावान् द्विजसत्तम ॥ ७ ॥ द्विजश्रेष्ठ! उशीनरके पुत्र क्षमाशील (और दयालु) राजा शिबिने (एक भूखे बाजको कबूतरके बदले) अपने शरीरका मांस अर्पित कर दिया था और उसीके प्रसादसे उन्हें परम दुर्लभ स्वर्गलोककी प्राप्ति हुई थी ॥ ७ ॥ स्वधर्म इति कृत्वा तु न त्यजामि द्विजोत्तम । पुरा कृतमिति ज्ञात्वा जीवाम्येतेन कर्मणा ॥ ८ ॥ 'विप्रवर! मैं अपना स्वधर्म समझकर यह धंधा नहीं छोड़ रहा हूँ। पहलेसे मेरे पूर्वज यही करते आये हैं, ऐसा समझकर मैं इसी कर्मसे जीवन-निर्वाह करता हूँ ॥ ८ ॥ स्वकर्म त्यजतो ब्रह्मन्नधर्म इह दृश्यते । स्वकर्मनिरतो यस्तु धर्मः स इति निश्चयः ॥ ९ ॥ 'ब्रह्मन्! अपने कर्मका परित्याग करनेवालेको यहाँ अधर्मकी प्राप्ति देखी जाती है। जो अपने कर्ममें तत्पर है, उसीका बर्ताव धर्मपूर्ण है, ऐसा सिद्धान्त है ॥ ९ ॥ पूर्वं हि विहितं कर्म देहिनं न विमुञ्चति । धात्रा विधिरयं दृष्टो बहुधा कर्मनिर्णये ॥ १० ॥ 'पहलेका किया हुआ कर्म देहधारी मनुष्यको नहीं छोड़ता है। बहुधा कर्मका निर्णय करते समय विधाताने इसी विधिको अपने सामने रखा है ॥ १० ॥ द्रष्टव्या तु भवेत् प्रज्ञा क्रूरे कर्मणि वर्तता । कथं कर्म शुभं कुर्यां कथं मुच्ये पराभवात् ॥ ११ ॥ 'जो क्रूर कर्ममें लगा हुआ है, उसे सदा यह सोचते रहना चाहिये कि 'मैं कैसे शुभ कर्म करूँ और किस प्रकार इस निन्दित कर्मसे छुटकारा पाऊँ' ॥ ११ ॥ कर्मणस्तस्य घोरस्य बहुधा निर्णयो भवेत् । दाने च सत्यवाक्ये च गुरुशुश्रूषणे तथा ॥ १२ ॥ द्विजातिपूजने चाहं धर्मे च निरतः सदा । अभिमानातिवादाभ्यां निवृत्तोऽस्मि द्विजोत्तम ॥ १३ ॥ 'बार-बार ऐसा करनेसे उस घोर कर्मसे छूटनेके विषयमें कोई निश्चित उपाय प्राप्त हो जाता है। द्विजश्रेष्ठ! मैं दान, सत्यभाषण, गुरुसेवा, ब्राह्मणपूजन तथा धर्मपालनमें सदा तत्पर रहकर अभिमान और अतिवादसे दूर रहता हूँ ॥ १२-१३ ॥ कृषिं साध्विति मन्यन्ते तत्र हिंसा परा स्मृता । कर्षन्तो लाङ्गलैः पुंसो घ्नन्ति भूमिशयान् बहून् । जीवानन्यांश्च बहुशस्तत्र किं प्रतिभाति ते ॥ १४ ॥ कुछ लोग खेतीको उत्तम मानते हैं, परंतु उसमें भी बहुत बड़ी हिंसा होती है। हल चलानेवाले मनुष्य धरतीके भीतर शयन करनेवाले बहुत-से प्राणियोंकी हत्या कर डालते हैं।