महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1452, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें‘आकाशसे लेकर पृथ्वीतक यह सारा जगत् जीवोंसे भरा हुआ है। कितने ही मनुष्य अनजानमें भी जीवहिंसा करते हैं। इस विषयमें आप क्या समझते हैं? ।। २२ ।। अहिंसेति यदुक्तं हि पुरुषैर्विस्मितैः पुरा । के न हिंसन्ति जीवान् वै लोकेऽस्मिन् द्विजसत्तम । बहु संचित्य इति वै नास्ति कश्चिदहिंसकः ।। २३ ।। ‘पूर्वकालके अभिमानशून्य श्रेष्ठ पुरुषोंने जो अहिंसाका उपदेश किया है (उसका तत्त्व समझना चाहिये; क्योंकि) द्विजश्रेष्ठ! (स्थूल दृष्टिसे देखा जाय तो) इस संसारमें कौन जीवहिंसा नहीं करते हैं? बहुत सोच-विचारकर मैं इस निश्चयपर पहुँचा हूँ कि कोई भी (क्रियाशील मनुष्य) अहिंसक नहीं है ।। २३ ।। अहिंसायां तु निरता यतयो द्विजसत्तम । कुर्वन्त्येव हि हिंसां ते यत्नादल्पतरा भवेत् ।। २४ ।। ‘द्विजश्रेष्ठ! यतिलोग अहिंसा-धर्मके पालनमें तत्पर होते हैं, परंतु वे भी हिंसा कर ही डालते हैं (अर्थात् उनके द्वारा भी हिंसा हो ही जाती है)। अवश्य ही यत्नपूर्वक चेष्टा करनेसे हिंसाकी मात्रा बहुत कम हो सकती है ।। २४ ।। आलक्ष्याश्चैव पुरुषाः कुले जाता महागुणाः । महाघोराणि कर्माणि कृत्वा लज्जन्ति वै द्विज ।। २५ ।। ‘ब्रह्मन्! उत्तम कुलमें उत्पन्न, परम सद्गुणसम्पन्न और श्रेष्ठ माने जानेवाले पुरुष भी अत्यन्त भयानक कर्म करके लज्जाका अनुभव करते ही हैं ।। २५ ।। सुहृदः सुहृदोऽन्यांश्च दुर्हृदश्चापि दुर्हृदः । सम्यक् प्रवृत्तान् पुरुषान् न सम्यगनुपश्यतः ।। २६ ।। ‘मित्र दूसरे मित्रोंको और शत्रु अपने शत्रुओंको, वे अच्छे कर्ममें लगे हुए हों तो भी अच्छी दृष्टिसे नहीं देखते ।। २६ ।। समृद्धैश्च न नन्दन्ति बान्धवा बान्धवैरपि । गुरूंश्चैव विनिन्दन्ति मूढाः पण्डितमानिनः ।। २७ ।। ‘बन्धु-बान्धव अपने समृद्धिशाली बान्धवोंसे भी प्रसन्न नहीं रहते। अपनेको पण्डित माननेवाले मूढ़ मनुष्य गुरुजनोंकी भी निन्दा करते हैं ।। २७ ।। बहु लोके विपर्यस्तं दृश्यते द्विजसत्तम । धर्मयुक्तमधर्मं च तत्र किं प्रतिभाति ते ।। २८ ।। ‘द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार जगत्में अनेक उलटी बातें दिखायी देती हैं। अधर्म भी धर्मसे युक्त प्रतीत होता है। इस विषयमें आप क्या समझते हैं? ।। २८ ।। वक्तुं बहुविधं शक्यं धर्माधर्मेषु कर्मसु । स्वकर्मनिरतो यो हि स यशः प्राप्नुयान्महत् ।। २९ ।।