भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1461

सन्ति ह्यागमविज्ञानाः शिष्टाः शास्त्रे विचक्षणाः ।
स्वधर्मेण क्रिया लोके कर्मणः सोऽप्यसंकरः ॥ ४५ ॥
संसारमें बहुत-से वेदवेत्ता और शास्त्रविचक्षण शिष्ट पुरुष विद्यमान हैं, उनके उपदेशके अनुसार स्वधर्मके पालनपूर्वक प्रत्येक कार्य करना चाहिये, इससे कर्मोंका संकर नहीं हो पाता ॥ ४५ ॥

प्राज्ञो धर्मेण रमते धर्म चैवोपजीवति ।
तस्माद् धर्मादवाप्तेन धनेन द्विजसत्तम ॥ ४६ ॥
तस्यैव सिञ्चते मूलं गुणान् पश्यति तत्र वै ।
द्विजश्रेष्ठ! बुद्धिमान् पुरुष धर्मसे ही आनन्द मानता है, धर्मका ही आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करता है और धर्मसे ही उपलब्ध किये हुए धनसे धनका ही मूल सींचता है, अर्थात् धर्मका पालन करता है। वह धर्ममें ही गुण देखता है ॥ ४६ १/२ ॥

धर्मात्मा भवति ह्येवं चित्तं चास्य प्रसीदति ॥ ४७ ॥
स मित्रजनसंतुष्ट इह प्रेत्य च नन्दति ।
इस प्रकार वह धर्मात्मा होता है, उसका अन्तःकरण निर्मल हो जाता है तथा मित्रजनोंसे संतुष्ट होकर वह इहलोक और परलोकमें भी आनन्दित होता है ॥ ४७ १/२ ॥

शब्दं स्पर्शं तथा रूपं गन्धानिष्टांश्च सत्तम ॥ ४८ ॥
प्रभुत्वं लभते चापि धर्मस्यैतत् फलं विदुः ।
सज्जनशिरोमणे! धर्मात्मा पुरुष शब्द, स्पर्श, रूप और प्रिय गन्ध—सभी प्रकारके विषय तथा प्रभुत्व भी प्राप्त करता है। उसकी यह स्थिति धर्मका ही फल मानी गयी है ॥ ४८ १/२ ॥

धर्मस्य च फलं लब्ध्वा न तृप्यति महाद्विज ॥ ४९ ॥
अतृप्यमाणो निर्वेदमापेदे ज्ञानचक्षुषा ।
द्विजोत्तम! कोई-कोई धर्मके फलरूपसे सांसारिक सुखको पाकर संतुष्ट नहीं होता। वह ज्ञानदृष्टिके कारण विषयभोगके सुखसे तृप्ति-लाभ न करके निर्वेद (वैराग्य)-को प्राप्त होता है ॥ ४९ १/२ ॥

प्रज्ञाचक्षुर्नर इह दोषं नैवानुरुध्यते ॥ ५० ॥
विरज्यति यथाकामं न च धर्मं विमुञ्चति ।
इस जगत्में ज्ञानदृष्टिसे सम्पन्न पुरुष राग-द्वेष आदि दोषोंका अनुसरण नहीं करता। उसे यथेष्ट वैराग्य होता है तथा वह कभी धर्मका त्याग नहीं करता है ॥

सर्वत्यागे च यतते दृष्ट्वा लोकं क्षयात्मकम् ॥ ५१ ॥
ततो मोक्षे प्रयतते नानुपायादुपायतः ।