महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन तेऽन्यद् दैवतं किंचिद् दैवतेष्वपि वर्तते । प्रयतत्वाद् द्विजातीनां दमेनासि समन्वितः ॥ १० ॥ हम इस घरमें इस प्रकार सुखसे रहते हैं मानो देवलोकमें पहुँच गये हों। देवताओंमें भी तुम्हारे लिये हम दोनोंके सिवा और कोई देवता नहीं है। तुम हमें ही देवता मानते हो। अपने मनको पवित्र एवं संयममें रखनेके कारण तुम द्विजोचित शम-दमसे सम्पन्न हो ॥ १० ॥
पितुः पितामहा ये च तथैव प्रपितामहाः । प्रीतास्ते सततं पुत्र दमेनावां च पूजया ॥ ११ ॥ वत्स! मेरे पिताके पितामह और प्रपितामह आदि सभी तुम्हारे इन्द्रियसंयमसे सदा प्रसन्न रहते हैं। हम दोनों भी तुम्हारे द्वारा की हुई पूजा-सेवासे बहुत संतुष्ट हैं ॥ ११ ॥
मनसा कर्मणा वाचा शुश्रूषा नैव हीयते । न चान्या हि तथा बुद्धिर्दृश्यते साम्प्रतं तव ॥ १२ ॥ तुम मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी हम दोनोंकी सेवा नहीं छोड़ते। इस समय भी तुम्हारा विचार इसके प्रतिकूल नहीं दिखायी देता ॥ १२ ॥
जामदग्न्येन रामेण यथा वृद्धौ सुपूजितौ । तथा त्वया कृतं सर्वं तद्विशिष्टं च पुत्रक ॥ १३ ॥ बेटा! जमदग्निनन्दन परशुरामने जिस प्रकार अपने वृद्ध माता-पिताकी सेवा-पूजा की थी, उसी प्रकार तथा उससे भी बढ़कर तुमने हमारी सब सेवाएँ की हैं ॥ १३ ॥
ततस्तं ब्राह्मणं ताभ्यां धर्मव्याधो न्यवेदयत् । तौ स्वागतेन तं विप्रमर्चयामासतुस्तदा ॥ १४ ॥ तदनन्तर धर्मव्याधने अपने माता-पिताको उस कौशिक ब्राह्मणका परिचय दिया। तब उन दोनोंने भी स्वागतपूर्वक ब्राह्मणका पूजन किया ॥ १४ ॥
प्रतिपूज्य च तां पूजां द्विजः पप्रच्छ तावुभौ । सुपुत्राभ्यां सभृत्याभ्यां कच्चिद् वां कुशलं गृहे ॥ १५ ॥ अनामयं च वां कच्चित् सदैवॆह शरीरयोः । ब्राह्मणने उनके द्वारा की हुई पूजाको स्वीकार करके कृतज्ञता प्रकट की और उनसे पूछा—'आप दोनों इस घरमें अपने सुयोग्य पुत्र तथा सेवकोंके साथ सकुशल तो हैं न? आप दोनों शरीरसे भी सदा नीरोग रहते हैं न?' ॥ १५१/२ ॥
वृद्धावूचतुः कुशलं नौ गृहे विप्र भृत्यवर्गे च सर्वशः । कच्चित् त्वमप्यविघ्नेन सम्प्राप्तो भगवन्निति ॥ १६ ॥ उन वृद्धोंने उत्तर दिया—ब्रह्मन्! इस घरमें हम दोनों सकुशल हैं। हमारे सेवक तथा कुटुम्बके लोग भी कुशलसे हैं। भगवन्! अपना समाचार कहें, आप यहाँ सकुशल पहुँच गये