महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1495, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंसहितो योधमुख्यैश्च मन्त्रिभिश्च सुसंवृतः । ततोऽभ्यहन् मृगांस्तत्र सुबहूनाश्रमं प्रति ॥ २५ ॥ ब्रह्मन्! इसी समय राजा अपने मन्त्रियों तथा प्रधान योद्धाओंके साथ शिकार खेलनेके लिये निकले। उन्होंने एक ऋषिके आश्रमके निकट बहुत-से हिंसक पशुओंका वध किया ॥ २४-२५ ॥
अथ क्षिप्तः शरो घोरो मयापि द्विजसत्तम । ताडितश्च ऋषिस्तेन शरेणानतपर्वणा ॥ २६ ॥ द्विजश्रेष्ठ! तदनन्तर मैंने भी एक भयानक बाण छोड़ा। उसकी गाँठ कुछ झुकी हुई थी। उस बाणसे एक ऋषि मारे गये ॥ २६ ॥
भूमौ निपतितो ब्रह्मन्नुवाच प्रतिनादयन् । नापराध्याम्यहं किंचित् केन पापमिदं कृतम् ॥ २७ ॥ ब्रह्मन्! बाण लगते ही वे मुनि पृथिवीपर गिर पड़े और अपने आर्तनादसे उस वन्य प्रदेशको गुँजाते हुए बोले, 'आह! मैं तो किसीका कोई अपराध नहीं करता हूँ। फिर किसने यह पापकर्म कर डाला?' ॥ २७ ॥
मन्वानस्तं मृगं चाहं सम्प्राप्तः सहसा प्रभो । अपश्यं तमृषिं विद्धं शरेणानतपर्वणा ॥ २८ ॥ प्रभो! मैंने उन्हें हिंसक पशु समझकर बाण मारा था। अतः सहसा उनके पास जा पहुँचा। वहाँ जाकर देखा कि झुकी हुई गाँठवाले उस बाणसे एक ऋषि घायल होकर धरतीपर पड़े हैं ॥ २८ ॥
अकार्यकरणाच्चापि भृशं मे व्यथितं मनः । तमुग्रतपसं विप्रं निष्तनन्तं महीतले ॥ २९ ॥ यह न करनेयोग्य पाप कर डालनेके कारण मेरे मनमें उस समय बड़ी पीड़ा हुई। वे उग्र तपस्वी ब्राह्मण उस समय धरतीपर पड़े-पड़े कराह रहे थे ॥ २९ ॥
अजानता कृतमिदं मयेत्यहमथाब्रुवम् । क्षन्तुमर्हसि मे सर्वमिति चोक्तो मया मुनिः ॥ ३० ॥ मैंने साहस करके उन मुनीश्वरसे कहा—'भगवन्! अनजानमें मेरे द्वारा यह अपराध बन गया है। अतः आप यह सब क्षमा कर दें' ॥ ३० ॥
ततः प्रत्यब्रवीद् वाक्यमृषिर्मां क्रोधमूर्च्छितः । व्याधस्त्वं भविता क्रूर शूद्रयोनाविति द्विज ॥ ३१ ॥ मेरी बात सुनकर ऋषि क्रोधसे व्याकुल हो गये और उत्तर देते हुए बोले—'निर्दयी ब्राह्मण! तू शूद्रयोनिमें जन्म लेकर व्याध होगा' ॥ ३१ ॥