भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1508

उनकी चौथी पुत्री 'अर्चिष्मती' है, (यही पूर्ण चन्द्रमासे युक्त होनेके कारण शुद्ध पौर्णमासी कही जाती है) इसकी प्रभासे लोग रातमें भी सब वस्तुओंको स्पष्ट देखते हैं। पाँचवीं कन्या 'हविष्मती' (प्रतिपद्युक्ता पूर्णिमा 'राका') है, जिसके सांनिध्यमें हविष्यद्वारा देवताओंका यजन किया जाता है। अंगिरा मुनिकी जो छठी पुण्यात्मा कन्या है, उसे 'महिष्मती' कहते हैं (यही चतुर्दशीयुक्ता पूर्णिमा है, जिसे 'अनुमति' भी कहते हैं) ।। ६ ।।
महामखेष्वाङ्गिरसी दीप्तिमत्सु महामते ।
महामतीति विख्याता सप्तमी कथ्यते सुता ।। ७ ।।
महामते! जो दीप्तिशाली सोमयाग आदि महायज्ञोंमें प्रकाशित होनेके कारण 'महामती' नामसे विख्यात है, वह (प्रतिपद्युक्त अमावास्या) अंगिरा मुनिकी सातवीं पुत्री कहलाती है ।। ७ ।।
यां तु दृष्ट्वा भगवतीं जनः कुहुकुहायते ।
एकानंशेति तामाहुः कुहूमङ्गिरसः सुताम् ।। ८ ।।
जिस भगवती अमाको देखकर लोग 'कुहु-कुहु' ध्वनि कर उठते (चकित हो जाते) हैं, अंगिरा मुनिकी वह आठवीं पुत्री 'कुहू' नामसे विख्यात है। उसमें चन्द्रमाकी एकमात्र कला अत्यन्त सूक्ष्म अंशसे शेष रहती है। (यही शुद्ध अमावस्या है) ।। ८ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि अङ्गिरसोपाख्याने अष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २१८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें अंगिरसोपाख्यानविषयक दो सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २१८ ।।