भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1510

(इसका जन्म शंयुकी दूसरी स्त्रीके गर्भसे हुआ था) ॥ ६ ॥ तिस्रः कन्या भवन्त्यन्या यासां स भरतः पतिः । भरतस्तु सुतस्तस्य भरत्येका च पुत्रिका ॥ ७ ॥ शंयुके तीन कन्याएँ और हुई, जिनका बड़ा भाई भरत ही पालन करता था। भरत (ऊर्ज)-के ‘भरत’ नामवाला ही एक पुत्र तथा ‘भरती’ नामकी एक कन्या हुई ॥ ७ ॥ भरतो भरतस्याग्नेः पावकस्तु प्रजापतेः । महानत्यर्थमहितस्तथा भरतसत्तम ॥ ८ ॥ सबका भरण-पोषण करनेवाले प्रजापति भरत नामक अग्निसे ‘पावक’ की उत्पत्ति हुई। भरतश्रेष्ठ! वह अत्यन्त महनीय (पूज्य) होनेके कारण ‘महान्’ कहा गया है ॥ ८ ॥ भरद्वाजस्य भार्या तु वीरा वीरस्य पिण्डदा । प्राहुराज्येन तस्येज्यां सोमस्येव द्विजाः शनैः ॥ ९ ॥ शंयुके पहले पुत्र भरद्वाजकी पत्नीका नाम ‘वीरा’ था, जिसने वीर नामक पुत्रको शरीर प्रदान किया। ब्राह्मणोंने सोमकी ही भाँति वीरकी भी आज्यभागसे पूजा बतायी है³। इनके लिये आहुति देते समय मन्त्रका उपांशु उच्चारण किया जाता है ॥ ९ ॥ हविषा यो द्वितीयेन सोमेन सह युज्यते । रथप्रभू रथध्वानः कुम्भरेताः स उच्यते ॥ १० ॥ सोमदेवताके साथ इन्हींको द्वितीय आज्यभाग प्राप्त होता है। इन्हें ‘रथप्रभु’, ‘रथध्वान’ और ‘कुम्भरेता’ भी कहते हैं ॥ १० ॥ सरय्वां जनयत् सिद्धिं भानुं भाभिः समावृणोत् । आग्नेयमानयन् नित्यमाह्वाने ह्येष सूयते ॥ ११ ॥ वीरने ‘सरयू’ नामवाली पत्नीके गर्भसे ‘सिद्धि’ नामक पुत्रको जन्म दिया। सिद्धिने अपनी प्रभासे सूर्यको भी आच्छादित कर लिया। सूर्यके आच्छादित हो जानेपर उसने अग्निदेवता-सम्बन्धी यज्ञका अनुष्ठान किया। आह्वान-मन्त्र (अग्निमग्न आवह इत्यादि)-में इस सिद्धि नामक अग्निकी ही स्तुति की जाती है ॥ ११ ॥ यस्तु न च्यवते नित्यं यशसा वर्चसा श्रिया । अग्निर्निश्च्यवनो नाम पृथिवीं स्तौति केवलम् ॥ १२ ॥ बृहस्पतिके (दूसरे) पुत्रका नाम ‘निश्च्यवन’ है। ये यश, वर्चस् (तेज) और कान्तिसे कभी च्युत नहीं होते हैं। निश्च्यवन अग्नि केवल पृथिवीकी स्तुति करते हैं२ ॥ विपाप्मा कलुषैर्मुक्तो विशुद्धश्चार्चिषा ज्वलन् । विपापोऽग्निः सुतस्तस्य सत्यः समयधर्मकृत् ॥ १३ ॥ वे निष्पाप, निर्मल, विशुद्ध तथा तेजःपुञ्जसे प्रकाशित हैं। उनका पुत्र ‘सत्य नामक अग्नि है; सत्य भी निष्पाप तथा कालधर्मके प्रवर्तक हैं ॥ १३ ॥