महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1512, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंउद्गद्वारं हविर्यस्य गृहे नित्यं प्रदीयते । ततः स्विष्टं भवेदाज्यं स्विष्टकृत् परमः स्मृतः ॥ २१ ॥ प्रत्येक गृह्यकर्ममें जिस अग्निके लिये सदा घीकी ऐसी धारा दी जाती है जिसका प्रवाह उत्तराभिमुख हो और इस प्रकार दी हुई वह घृतकी आहुति अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि करती है। इसीलिये उस उत्कृष्ट अग्निका नाम ‘स्विष्टकृत्’ है। (उसे बृहस्पतिका छठा पुत्र समझना चाहिये) ॥ २१ ॥
यः प्रशान्तेषु भूतेषु मन्युर्भवति पावकः । क्रुद्धस्य तु रसो जज्ञे मन्युतीव्रा च पुत्रिका । स्वाहेति दारुणा क्रूरा सर्वभूतेषु तिष्ठति ॥ २२ ॥ जिस समय अग्निस্বরূপ बृहस्पतिका क्रोध प्रशान्त प्राणियोंपर प्रकट हुआ उस समय उनके शरीरसे जो पसीना निकला, वही उनकी पुत्रीके रूपमें परिणत हो गया। वह पुत्री अधिक क्रोधवाली थी। वह ‘स्वाहा’ नामसे प्रसिद्ध हुई। वह दारुण एवं क्रूर कन्या सम्पूर्ण भूतोंमें निवास करती है ॥ २२ ॥
त्रिदिवे यस्य सदृशो नास्ति रूपेण कश्चन । अतुलत्वात् कृतो देवैर्नाम्ना कामस्तु पावकः ॥ २३ ॥ स्वर्गमें भी कहीं तुलना न होनेके कारण जिसके समान रूपवान् दूसरा कोई नहीं है, उस स्वाहा-पुत्रको देवताओंने ‘काम’ नामक अग्नि कहा है ॥ २३ ॥
संहर्षाद् धारयन् क्रोधं धन्वी स्रग्वी रथे स्थितः । समरे नाशयेच्छत्रूनमोघो नाम पावकः ॥ २४ ॥ जो हृदयमें क्रोध धारण किये धनुष और मालासे विभूषित हो रथपर बैठकर हर्ष और उत्साहके साथ युद्धमें शत्रुओंका नाश करते हैं, उसका नाम है ‘अमोघ’ अग्नि ॥
उक्थो नाम महाभाग त्रिभिरुक्थैरभिष्टुतः । महावाचं त्वजनयत् समाश्वासं हि यं विदुः ॥ २५ ॥ महाभाग! ब्राह्मणलोग त्रिविध उक्थ मन्त्रोंद्वारा जिसकी स्तुति करते हैं, जिसने महावाणी (परा)-का आविष्कार किया है तथा ज्ञानी पुरुष जिसे आश्वासन देनेवाला समझते हैं; उस अग्निका नाम ‘उक्थ’ है ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि आंगिरसोपाख्याने एकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानविषयक दो सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१९ ॥