भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 152

ततः साम्बाय राजेन्द्र क्षेमवृद्धिपि स्वयम् । मुमोच मायाविहितं शरजालं महत्तरम् ॥ १४ ॥ राजेन्द्र! तदनन्तर क्षेमवृद्धिने स्वयं भी साम्बके ऊपर मायानिर्मित बाणोंकी भारी वर्षा प्रारम्भ की ॥ १४ ॥ ततो मायामयं जालं माययैव विदीर्य सः । साम्बः शरसहस्रेण रथमस्याभ्यवर्षत ॥ १५ ॥ साम्बने उस मायामय बाणजालको मायासे ही छिन्न-भिन्न करके क्षेमवृद्धिके रथपर सहस्रों बाणोंकी झड़ी लगा दी ॥ १५ ॥ ततः स विद्धः साम्बेन क्षेमवृद्धिश्शमूपतिः । अपायाज्जवनैरश्वैः साम्बबाणप्रपीडितः ॥ १६ ॥ साम्बने सेनापति क्षेमवृद्धिको अपने बाणोंसे घायल कर दिया। वह साम्बकी बाणवर्षासे पीड़ित हो शीघ्रगामी अश्वोंकी सहायतासे (लड़ाईका मैदान छोड़कर) भाग गया ॥ १६ ॥ तस्मिन् विप्रद्रुते क्रूरे शाल्वस्याथ चमूपतौ ।