भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1531

पुरंदरस्तु तामाह मा भैर्नास्ति भयं तव । एवमुक्त्वा ततोऽपश्यत् केशिनं स्थितमग्रतः ॥ ८ ॥ यह सुनकर इन्द्रने उससे कहा—‘भद्रे! डरो मत, अब तुम्हें कोई भय नहीं है।’ ऐसा कहकर जब उन्होंने उधर दृष्टि डाली, तब केशी दानव सामने खड़ा दिखायी दिया ॥ ८ ॥

किरीटिनं गदापाणिं धातुमन्तमिवाचलम् । हस्ते गृहीत्वा कन्यां तामथैनं वासवोऽब्रवीत् ॥ ९ ॥ उसने मस्तकपर किरीट धारण कर रखा था। उसके हाथमें गदा थी और वह एक कन्याका हाथ पकड़े विविध धातुओंसे विभूषित पर्वत-सा जान पड़ता था। यह देख इन्द्रने उससे कहा— ॥ ९ ॥

अनार्यकर्मन् कस्मात् त्वमिमां कन्यां जिहीर्षसि । वज्रिणं मां विजानीहि विरमास्याः प्रबाधनात् ॥ १० ॥ ‘रे नीच कर्म करनेवाले दानव! तू कैसे इस कन्याका अपहरण करना चाहता है? समझ ले, मैं वज्रधारी इन्द्र हूँ। अब इस अबलाको सताना छोड़ दे ॥ १० ॥

केश्युवाच

विसृजस्व त्वमेवैनां शक्रैषा प्रार्थिता मया । क्षमं ते जीवतो गन्तुं स्वपुरं पाकशासन ॥ ११ ॥ केशी बोला—इन्द्र! तू ही इसे छोड़ दे। मैंने इसका वरण कर लिया है। पाकशासन! ऐसा करनेपर ही तू जीता-जागता अपनी अमरावती पुरीको लौट सकता है ॥ ११ ॥

एवमुक्त्वा गदां केशी चिक्षेपेन्द्रवधाय वै । तामापतन्तीं चिच्छेद मध्ये वज्रेण वासवः ॥ १२ ॥ ऐसा कहकर केशीने इन्द्रका वध करनेके लिये अपनी गदा चलायी। परंतु इन्द्रने अपने वज्रद्वारा उस आती हुई गदाको बीचसे ही काट डाला ॥ १२ ॥

अथास्य शैलशिखरं केशी क्रुद्धो व्यवासृजत् । तदा पतन्तं सम्प्रेक्ष्य शैलशृङ्गं शतक्रतुः ॥ १३ ॥ बिभेद राजन् वज्रेण भुवि तन्निपपात ह । पतता तु तदा केशी तेन शृङ्गेण ताडितः ॥ १४ ॥ तब केशीने कुपित होकर इन्द्रपर पर्वतकी एक चट्टान फेंकी। राजन्! उस शैलशिखरको अपने ऊपर गिरता देख इन्द्रने वज्रसे उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये और वह चूर-चूर होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। उस समय गिरते हुए उस शिलाखण्डने केशीको ही भारी चोट पहुँचायी ॥

हित्वा कन्यां महाभागां प्राद्रवद् भृशपीडितः । अपयातेऽसुरे तस्मिंस्तां कन्यां वासवोऽब्रवीत् ।