भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 154

तदनन्तर रुक्मिणीनन्दन चारुदेष्णने अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी शत्रुनाशक बाणको महान् (दिव्य) अस्त्रसे अभिमन्त्रित करके अपने धनुषपर संधान किया ।। २५ ।। स विविन्ध्याय सक्रोधः समाहूय महारथः । चिक्षेप मे सुतो राजन् स गतासुरथापतत् ।। २६ ।। राजन्! तत्पश्चात् मेरे उस महारथी पुत्रने क्रोधमें भरकर विविन्ध्यपर वह बाण चलाया। उसके लगते ही विविन्ध्य प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ।। २६ ।। विविन्ध्यं निहतं दृष्ट्वा तां च विक्षोभितां चमूम् । कामगेन स सौभेन शाल्वः पुनरुपागमत् ।। २७ ।। विविन्ध्यको मारा गया और सेनाको तहस-नहस हुई देख शाल्व इच्छानुसार चलनेवाले सौभ विमानद्वारा फिर वहाँ आया ।। २७ ।। ततो व्याकुलितं सर्वं द्वारकावासि तद् बलम् । दृष्ट्वा शाल्वं महाबाहो सौभस्थं नृपते तदा ।। २८ ।। महाबाहु नरेश्वर! उस समय सौभ विमानपर बैठे हुए शाल्वको देखकर द्वारकाकी सारी सेना भयसे व्याकुल हो उठी ।। २८ ।। ततो निर्याय कौरव्य अवस्थाप्य च तद् बलम् । आनर्तानां महाराज प्रद्युम्नो वाक्यमब्रवीत् ।। २९ ।। महाराज कुरुनन्दन! तब प्रद्युम्नने निकलकर आनर्तवासियोंकी उस सेनाको धीरज बँधाया और इस प्रकार कहा— ।। २९ ।। सर्वे भवन्तस्तिष्ठन्तु सर्वे पश्यन्तु मां युधि । निवारयन्तं संग्रामे बलात् सौभं सराजकम् ।। ३० ।। ‘यादवो! आप सब लोग (चुपचाप) खड़े रहें और मेरे पराक्रमको देखें; मैं किस प्रकार युद्धमें राजा शाल्वके सहित सौभ विमानकी गतिको रोक देता हूँ ।। ३० ।। अहं सौभपतेः सेनामायसैर्भुजगैरिव । धनुर्भुजविनिर्मुक्तैर्नाशयाम्यद्य यादवाः ।। ३१ ।। ‘यदुवंशियो! मैं अपने धनुर्दण्डसे छूटे हुए लोहेके सर्पतुल्य बाणोंद्वारा सौभपति शाल्वकी सेनाको अभी नष्ट किये देता हूँ’ ।। ३१ ।। आश्वसध्वं न भीः कार्या सौभराडद्य नश्यति । मयाभिपन्नो दुष्टात्मा ससौभो विनशिष्यति ।। ३२ ।। ‘आप धैर्य धारण करें, भयभीत न हों, सौभराज अभी नष्ट हो रहा है। दुष्टात्मा शाल्व मेरा सामना होते ही सौभ विमानसहित नष्ट हो जायगा’ ।। ३२ ।। एवं ब्रुवति संहृष्टे प्रद्युम्ने पाण्डुनन्दन । विष्ठितं तद् बलं वीर युयुधे च यथासुखम् ।। ३३ ।।