भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1542, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1542

सा तत्र सहसा गत्वा शैलपृष्ठं सुदुर्गमम् ।। १२ ।।
प्राक्षिपत् काञ्चने कुण्डे शुक्रं सा त्वरिता शुभा ।
अनेकानेक नदी और झरने वहाँ बहते थे, तथा नाना प्रकारके वृक्ष उस पर्वतकी शोभा बढ़ाते थे। शुभस्वरूपा स्वाहा देवीने सहसा उस दुर्गम शैलशिखरपर जाकर एक सुवर्णमय कुण्डमें शीघ्रतापूर्वक उस शुक्र (वीर्य)-को डाल दिया ।। १२ १/२ ।।
सप्तानामपि सा देवी सप्तर्षीणां महात्मनाम् ।। १३ ।।
पत्नीसरूपतां कृत्वा कामयामास पावकम् ।
दिव्यरूपमरुन्धत्याः कर्तुं न शकितं तया ।। १४ ।।
तस्यास्तपःप्रभावेण भर्तृशुश्रूषणेन च ।
षट्कृत्वस्तत् तु निक्षिप्तमग्ने रेतः कुरूत्तम ।। १५ ।।
कुरुश्रेष्ठ! उस देवीने सातों महात्मा सप्तर्षियोंकी पत्नियोंके समान रूप धारण करके अग्निदेवके साथ समागमकी इच्छा की थी; किंतु अरुन्धतीकी तपस्या तथा पति-शुश्रूषाके प्रभावसे वह उनका दिव्य रूप धारण न कर सकी, इसलिये छः बार ही अग्निके वीर्यको वहाँ डालनेमें सफल हुई ।। १३–१५ ।।
तस्मिन् कुण्डे प्रतिपदि कामिन्या स्वाहया तदा ।
तत् स्कन्नं तेजसा तत्र संवृतं जनयत् सुतम् ।। १६ ।।
ऋषिभिः पूजितं स्कन्नमनयत् स्कन्दतां ततः ।
षट्शिरा द्विगुणश्रोत्रो द्वादशाक्षिभुजक्रमः ।। १७ ।।
अग्निदेवकी कामना रखनेवाली स्वाहाने प्रतिपदाको उस कुण्डमें उनका वीर्य डाला था। स्कन्दित (स्खलित) हुए उस वीर्यने वहाँ एक तेजस्वी पुत्रको जन्म दिया। ऋषियोंने उसका बड़ा सम्मान किया। वह स्कन्दित होनेके कारण स्कन्द कहलाया। उसके छः सिर, बारह कान, बारह नेत्र और बारह भुजाएँ थीं ।। १६-१७ ।।

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