भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1556, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1556

कुमार्य ऊचुः

भवेम सर्वलोकस्य मातरो वयमुत्तमाः ॥ ७ ॥ प्रसादात् तव पूज्याश्च प्रियमेतत् कुरुष्व नः । कुमारियाँ बोलीं— हम सब लोग सम्पूर्ण जगत्‌की श्रेष्ठ माताएँ हों और आपकी कृपासे हम सदा पूजनीय मानी जायँ, यही हमारा प्रिय मनोरथ है, आप इसे पूर्ण कीजिये ॥ ७ १/२ ॥

सोऽब्रवीद् बाढमित्येवं भविष्यध्वं पृथग्विधाः ॥ ८ ॥ शिवाश्चैवाशिवाश्चैव पुनः पुनरुदारधीः । ततः संकल्प्य पुत्रत्वे स्कन्दं मातृगणोऽगमत् ॥ ९ ॥ तब उदारबुद्धि स्कन्दने बार-बार कहा—‘बहुत अच्छा, तुम सब लोग पृथक्-पृथक् पूजनीया माता मानी जाओगी। तुम्हारे दो भेद होंगे—शिवा और अशिवा।’ तदनन्तर स्कन्दको अपना पुत्र मानकर मातृकाएँ वहाँसे विदा हो गयीं ॥ ८-९ ॥

काकी च हलिमा चैव मालिनी बृंहता तथा । आर्या पलाना वैमित्रा सप्तैताः शिशुमातरः ॥ १० ॥ काकी, हलिमा, मालिनी, बृंहता, आर्या, पलाना और वैमित्रा—ये सातों शिशुकी माताएँ हैं ॥ १० ॥

एतासां वीर्यसम्पन्नः शिुर्नामातिदारुणः । स्कन्दप्रसादजः पुत्रो लोहिताक्षो भयंकरः ॥ ११ ॥ भगवान् स्कन्दकी कृपासे इन्हें शिशु नामक एक अत्यन्त पराक्रमी पुत्र प्राप्त हुआ, जो अत्यन्त दारुण और भयंकर था। उसकी आँखें रक्तवर्णकी थीं ॥ ११ ॥

एष वीराष्टकः प्रोक्तः स्कन्दमातृगणोद्भवः । छागवक्त्रेण सहितो नवकः परिकीर्त्यते ॥ १२ ॥ शिशु और मातृगणोंको लेकर जो आठ व्यक्ति होते हैं, उन्हें ‘वीराष्टक’ कहा गया है। बकरेके-से मुखसे युक्त स्कन्दको सम्मिलित करनेसे यह समुदाय वीर-नवक कहा जाता है ॥ १२ ॥

षष्ठं छागमयं वक्त्रं स्कन्दस्यैवेति विद्धि तत् । षट्शिरोऽभ्यन्तरं राजन् नित्यं मातृगणार्चितम् ॥ १३ ॥ युधिष्ठिर! स्कन्दका ही छठा मुख छागमय है, यह जान लो। राजन्! वह छः सिरोंके बीचमें स्थित है और मातृकाएँ सदा उसकी पूजा करती हैं ॥ १३ ॥

षण्णां तु प्रवरं तस्य शीर्षाणामिह शब्द्यते । शक्तिं येनासृजद् दिव्यां भद्रशाख इति स्म ह ॥ १४ ॥ स्कन्दके छहों मस्तकोंमें वही सर्वश्रेष्ठ बताया जाता है। उन्होंने दिव्यशक्तिका प्रयोग किया था; इसलिये उनका नाम भद्रशाख हुआ ॥ १४ ॥

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