महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्वमेव राजा भद्रं ते त्रैलोक्यस्य ममैव च ।। १९ ।। करोमि किं च ते शक्र शासनं तद् ब्रवीहि मे । **स्कन्द बोले—**देवेन्द्र! आप ही देवराजके पदपर प्रतिष्ठित रहें। आपका कल्याण हो। आप ही तीनों लोकोंके तथा मेरे भी स्वामी हैं। आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ—? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।। १९ १/२ ।।
इन्द्र उवाच
अहमिन्द्रो भविष्यामि तव वाक्यान्महाबल ।। २० ।। यदि सत्यमिदं वाक्यं निश्चयाद् भाषितं त्वया । यदि वा शासनं स्कन्द कर्तुमिच्छसि मे शृणु ।। २१ ।। अभिषिञ्चस्व देवानां सेनापत्ये महाबल । **इन्द्रने कहा—**महाबलवान् स्कन्द! मैं तुम्हारे कहनेसे इन्द्र-पदपर प्रतिष्ठित रहूँगा। यदि वास्तवमें तुम मेरी आज्ञाका पालन करना चाहते हो, यदि तुमने यह निश्चित बात कही है, अथवा यदि तुम्हारा यह कथन सत्य है तो मेरी यह बात सुनो—महावीर! तुम देवताओंके सेनापतिके पदपर अपना अभिषेक करा लो ।। २०-२१ १/२ ।।
स्कन्द उवाच
दानवानां विनाशाय देवानामर्थसिद्धये ।। २२ ।। गोब्राह्मणहितार्थाय सेनापत्येऽभिषिञ्च माम् । **स्कन्द बोले—**देवराज! दानवोंके विनाश, देवताओंके कार्यकी सिद्धि तथा गौओं और ब्राह्मणोंके हितके लिये आप सेनापतिके पदपर मेरा अभिषेक कीजिये ।। २२ १/२ ।।
मार्कण्डेय उवाच
सोऽभिषिक्तो मघवता सर्वैर्देवगणैः सह ।। २३ ।। अतीव शुशुभे तत्र पूज्यमानो महर्षिभिः । तत्र तत् काञ्चनं छत्रं ध्रियमाणं व्यरोचत ।। २४ ।। यथैव सुसमिद्धस्य पावकस्यात्ममण्डलम् । **मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर समस्त देवताओंसहित इन्द्रने कुमारका देवसेनापतिके पदपर अभिषेक कर दिया। उस सयम वहाँ महर्षियोंद्वारा पूजित होकर स्कन्दकी बड़ी शोभा हुई। उनके ऊपर तना हुआ वह सुवर्णमय छत्र उद्भासित हो रहा था, मानो प्रज्वलित अग्निका अपना ही मण्डल प्रकाशित होता हो ।। २३-२४ १/२ ।। विश्वकर्मकृता चास्य दिव्या माला हिरण्मयी ।। २५ ।। आबद्धा त्रिपुरघ्नेन स्वयमेव यशस्विना । आगम्य मनुजव्याघ्र सह देव्या परंतप ।। २६ ।।