भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1564

उस समय इन सबसे घिरे हुए अग्निनन्दन कार्तिकेय देवताओंद्वारा अभिषिक्त हो भाँति-भाँतिकी क्रीडाएँ करते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे। देवताओंने सेनापति पदपर अभिषिक्त हुए कुमार महासेनको इस प्रकार देखा, मानो सूर्यदेव अन्धकारका नाश करके उदित हुए हों॥ ४१ १/२॥ अथैनमभ्ययुः सर्वा देवसेनाः सहस्रशः ॥ ४२ ॥ अस्माकं त्वं पतिरिति ब्रुवाणाः सर्वतो दिशः । तदनन्तर सारी देवसेनाएँ सहस्रोंकी संख्यामें सब दिशाओंसे उनके पास आयीं और कहने लगीं—'आप ही हमारे पति हैं'॥ ४२ १/२॥ ताः समासाद्य भगवान् सर्वभूतगणैर्वृतः ॥ ४३ ॥ अर्चितस्तु स्तुतश्चैव सान्त्वयामास ता अपि । समस्त भूतगणोंसे घिरे हुए भगवान् स्कन्दने उन देवसेनाओंको अपने समीप पाकर उन्हें सान्त्वना दी और स्वयं भी उनके द्वारा पूजित तथा प्रशंसित हुए॥ ४३ १/२॥ शतक्रतुश्चाभिषिच्य स्कन्दं सेनापतिं तदा ॥ ४४ ॥ सस्मार तां देवसेनां या सा तेन विमोक्षिता । उस समय इन्द्रने स्कन्दको सेनापति पदपर अभिषिक्त करनेके पश्चात् उस कुमारी देवसेनाका स्मरण किया, जिसका उन्होंने केशीके हाथसे उद्धार किया था॥ ४४ १/२॥ अयं तस्याः पतिर्नूनं विहितो ब्रह्मणा स्वयम् ॥ ४५ ॥ विचिन्त्येत्यानयामास देवसेनां ह्यलंकृताम् । उन्होंने सोचा, स्वयं ब्रह्माजीने निश्चय ही कुमार कार्तिकेयको ही उसका पति नियत किया है। यह सोचकर वे देवसेनाको वस्त्राभूषणोंसे भूषित करके ले आये॥ स्कन्दं प्रोवाच बलभिदियं कन्या सुरोत्तम ॥ ४६ ॥ अजाते त्वयि निर्दिष्टा तव पत्नी स्वयम्भुवा । तस्मात् त्वमस्या विधिवत् पाणिं मन्त्रपुरस्कृतम् ॥ ४७ ॥ गृहाण दक्षिणं देव्याः पाणिना पद्मवर्चसा । एवमुक्तः स जग्राह तस्याः पाणिं यथाविधि ॥ ४८ ॥ फिर बलसंहारक इन्द्रने स्कन्दसे कहा—'सुरश्रेष्ठ! तुम्हारे जन्म लेनेके पहलेसे ही ब्रह्माजीने इस कन्याको तुम्हारी पत्नी नियत की है, अतः तुम वेदमन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक इसका विधिवत् पाणिग्रहण करो। अपने कमलकी-सी कान्तिवाले हाथसे इस देवीका दायाँ हाथ पकड़ो।' इन्द्रके ऐसा कहनेपर स्कन्दने विधिपूर्वक देवसेनाका पाणिग्रहण किया॥ ४६—४८॥