महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1571, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्कन्द बोले—देवियो! आपलोगोंने यह दुःखकी बात कही है, तो भी मैं आपको पहलेकी मातृकाओंकी संतानको अर्पित कर देता हूँ; परंतु आपलोग उन सबकी रक्षा करें; इसीसे आपका भला होगा। मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ ॥ २० ॥
मातर ऊचुः
परिरक्षाम भद्रं ते प्रजाः स्कन्द यथेच्छसि । त्वया नो रोचते स्कन्द सहवासश्चिरं प्रभो ॥ २१ ॥ माताओंने कहा—स्कन्द! जैसी तुम्हारी इच्छा है, उसके अनुसार हम उन संतानोंकी रक्षा अवश्य करेंगी। शक्तिशाली कुमार! हमें दीर्घकालतक तुम्हारे साथ रहनेकी इच्छा है ॥ २१ ॥
स्कन्द उवाच
यावत् षोडश वर्षाणि भवन्ति तरुणाः प्रजाः । प्रबाधत मनुष्याणां तावद्रूपैः पृथग्विधैः ॥ २२ ॥ स्कन्द बोले—संसारके मनुष्य जबतक सोलह वर्षके तरुण न हो जायँ, तबतक आप मानव-प्रजाको पृथक्-पृथक् उतने ही रूप धारण करके संताप दे सकती हैं ॥ २२ ॥ अहं च वः प्रदास्यामि रौद्रमात्मानमव्ययम् । परमं तेन सहिताः सुखं वत्स्यथ पूजिताः ॥ २३ ॥ मैं आपलोगोंको एक भयंकर एवं अविनाशी पुरुष प्रदान करूँगा, जो मेरा अभिन्न स्वरूप होगा। उसके साथ सम्मानपूर्वक रहकर आपलोग परम सुखकी भागिनी होंगी ॥ २३ ॥
मार्कण्डेय उवाच
ततः शरीरात् स्कन्दस्य पुरुषः पावकप्रभः । भोक्तुं प्रजाः स मर्त्यानां निष्पपात महाप्रभः ॥ २४ ॥ मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर स्कन्दके शरीरसे अग्निके समान तेजस्वी तथा परम कान्तिमान् एक पुरुष प्रकट हुआ, जो समस्त मानव-प्रजाको खा जानेकी इच्छा रखता था ॥ २४ ॥ अपतत् सहसा भूमौ विसंज्ञोऽथ क्षुधार्दितः । स्कन्देन सोऽभ्यनुज्ञातो रौद्ररूपोऽभवद् ग्रहः ॥ २५ ॥ वह पैदा होते ही भूखसे पीडित हो सहसा अचेत होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। फिर स्कन्दकी आज्ञासे वह भयंकर रूपधारी ग्रह हो गया ॥ २५ ॥ स्कन्दापस्मारमित्याहुर्ग्रहं तं द्विजसत्तमाः । विनता तु महारौद्रा कथ्यते शकुनिग्रहः ॥ २६ ॥