भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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उनके मुखका रंग तनिक भी नहीं बदलता था। उनके अंग भी विचलित नहीं होते थे। सब ओर गर्जना करते हुए प्रद्युम्नका उत्तम एवं अद्भुत बल-पराक्रमका सूचक सिंहनाद सब लोगोंको सुनायी देता था ।। ६ ।। जलेचरः काञ्चनयष्टिसंस्थो व्यात्ताननः सर्वतिमिप्रमाथी । वित्रासयन् राजति वाहमुख्ये शाल्वस्य सेनाप्रमुखे ध्वजाग्रयः ।। ७ ।। शाल्वकी सेनाके ठीक सामने प्रद्युम्नके श्रेष्ठ रथपर उनकी उत्तम ध्वजा फहराती हुई शोभा पा रही थी। उस ध्वजाके सुवर्णमय दण्डके ऊपर सब तिमि नामक जल-जन्तुओंका प्रमथन करनेवाले मुँह बाये एक मगरमच्छका चिह्न था। वह शत्रुसैनिकोंको अत्यन्त भयभीत कर रहा था ।। ७ ।। ततस्तूर्णं विनिष्पत्य प्रद्युम्नः शत्रुकर्षणः । शाल्वमेवाभिदुद्राव विधित्सुः कलहं नृप ।। ८ ।। नरेश्वर! तदनन्तर शत्रुहन्ता प्रद्युम्न तुरंत आगे बढ़कर राजा शाल्वके साथ युद्ध करनेकी इच्छासे उसीकी ओर दौड़े ।। ८ ।। अभियानं तु वीरेण प्रद्युम्नेन महारणे । नामर्षयत संक्रुद्धः शाल्वः कुरुकुलोद्वह ।। ९ ।। कुरुकुलतिलक! उस महासंग्राममें वीर प्रद्युम्नके द्वारा किया हुआ वह आक्रमण क्रुद्ध हुआ राजा शाल्व न सह सका ।। ९ ।। स रोषमदमत्तो वै कामगादवरुह्य च । प्रद्युम्नं योधयामास शाल्वः परपुरंजयः ।। १० ।। शत्रुकी राजधानीपर विजय पानेवाले शाल्वने रोष एवं बलके मदसे उन्मत्त हो इच्छानुसार चलनेवाले विमानसे उतरकर प्रद्युम्नसे युद्ध आरम्भ किया ।। १० ।। तयोः सुतुमुलं युद्धं शाल्ववृष्णिप्रवीरयोः । समेता ददृशुर्लोका बलिवासवयोरिव ।। ११ ।। शाल्व तथा वृष्णिवंशी वीर प्रद्युम्नमें बलि और इन्द्रके समान घोर युद्ध होने लगा। उस समय सब लोग एकत्र होकर उन दोनोंका युद्ध देखने लगे ।। ११ ।। तस्य मायामयो वीर रथो हेमपरिष्कृतः । सपताकः सध्वजश्च सानुकर्षः स तूणवान् ।। १२ ।। वीर! शाल्वके पास सुवर्णभूषित मायामय रथ था। वह रथ ध्वजा, पताका, अनुकर्ष (हरसा)* और तरकससे युक्त था ।। १२ ।। स तं रथवरं श्रीमान् समारुह्य किल प्रभो । मुमोच बाणान् कौरव्य प्रद्युम्नाय महाबलः ।। १३ ।।