भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1587

उस महासमरमें असुरोंकी मार खाकर वे सब देवता भागते हुए कहीं कोई रक्षक नहीं

पा रहे थे। किन्हींके सिर फट गये थे तो किन्हींके सब अंगोंमें गहरे घाव हो गये थे ।। ६७ १/३

।।

अथ तद् विद्रुतं सैन्यं दृष्ट्वा देवः पुरंदरः ।। ६८ ।।

आश्वासयन्नुवाचेदं बलभिद् दानवार्दितम् ।

भयं त्यजत भद्रं वः शूराः शस्त्राणि गृह्णत ।। ६९ ।।

कुरुध्वं विक्रमे बुद्धिं मा वः काचिद् व्यथा भवेत् ।

जयतैनान् सुदुर्धृत्तान् दानवान् घोरदर्शनान् ।। ७० ।।

अभिद्रवत भद्रं वो मया सह महासुरान् ।

शक्रस्य वचनं श्रुत्वा समाश्वस्ता दिवौकसः ।। ७१ ।।

तदनन्तर बलासुरविनाशक देवराज इन्द्रने अपनी उस सेनाको दानवोंसे पीड़ित होकर

भागती देख उसे आश्वासन देते हुए कहा- 'शूरवीरो! भय त्याग दो, इससे तुम्हारा मंगल

होगा। हथियार उठाओ और पराक्रममें मन लगाओ। तुम्हें किसी प्रकार व्यथित नहीं होना

चाहिये। इन भयंकर दिखायी देनेवाले दुराचारी दानवोंको जीतो। तुम्हारा कल्याण हो। तुम

सब लोग मेरे साथ इन महाकाय दैत्योंपर टूट पड़ो।' इन्द्रकी यह बात सुनकर देवताओंको

बड़ी सान्त्वना मिली ।। ६८-७१ ।।

दानवान् प्रत्ययुध्यन्त शक्रं कृत्वा व्यपाश्रयम् ।

ततस्ते त्रिदशाः सर्वे मरुतश्च महाबलाः ।। ७२ ।।

प्रत्युद्ययुर्महाभागाः साध्याश्च वसुभिः सह ।

उन्होंने इन्द्रको अपना आश्रय बनाकर दानवोंके साथ पुनः युद्ध प्रारम्भ किया।

तत्पश्चात् वे सभी देवता महाबली मरुद्गण तथा वसुओं एवं महाभाग साध्यगण-सहित

युद्धभूमिमें आगे बढ़ने लगे ।। ७२ १/२ ।।

तैर्विसृष्टान्यनीकेषु क्रुद्धैः शस्त्राणि संयुगे ।। ७३ ।।

शराश्च दैत्यकायेषु पिबन्ति रुधिरं बहु ।

उन्होंने संग्राममें कुपित होकर दैत्योंकी सेनाओंके ऊपर जो अस्त्र-शस्त्र और बाण

चलाये, वे उनके शरीरोंमें घुसकर प्रचुर मात्रामें रक्त पीने लगे ।। ७३ १/२ ।।

तेषां देहान् विनिर्भिद्य शरास्ते निशितास्तदा ।। ७४ ।।

निपतन्तोऽभ्यदृश्यन्त नगेभ्य इव पन्नगाः ।

वे तीखे बाण उस समय दैत्योंके शरीरोंको विदीर्ण कर रणभूमिमें इस प्रकार गिरते

दिखायी देते थे, मानो वृक्षोंसे सर्प गिर रहे हों ।। ७४ १/२ ।।

तानि दैत्यशरीराणि निर्भिन्नानि स्म सायकैः ।। ७५ ।।

अपतन् भूतले राजंश्छिन्नाभ्राणीव सर्वशः ।